एन. रघुरामन का कॉलम:  डायबिटीज और ऑटिज्म वाले खिलौने भी बिजनेस खड़ा कर सकते हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: डायबिटीज और ऑटिज्म वाले खिलौने भी बिजनेस खड़ा कर सकते हैं

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26 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

वो दिन याद करें, जब बच्चे रसोई के सामान से खेलते थे, क्योंकि गिलास, प्लेट और चूल्हे जैसी छोटी एक्सेसरीज उन्हें असल जिंदगी की ऐसी परिस्थितियों से परिचित कराती थीं- जिनका सामना उन्हें जीवन में करना होगा। लेकिन दुर्भाग्य से आज के बच्चों को कुछ बीमारियां हैं और टॉय मेकर्स उन्हें उस बीमारी के साथ जीने के लिए तैयार कर रहे हैं।

टाइप 1 डायबिटीज (टी1डी) वाले खिलौनों को ही लीजिए। जब जुलाई 2025 में टी1डी वाली बार्बी डॉल्स बाजार में आईं, तो उसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। जानते हैं क्यों? क्योंकि इसमें बीमारी को सामान्य बनाने, भ्रांतियों को कम करने और डायबिटीज वाले बच्चों को सही प्रतिनिधित्व देने की ताकत थी। इस बार्बी के साथ इंसुलिन पम्प और ग्लूकोज मॉनिटर जैसी एक्सेसरीज थीं। ये रियलिस्टिक डिटेल्स बच्चों के लिए शिक्षाप्रद थीं, जिनसे बच्चों को उन्हें देखने-समझने और दूसरे बच्चों को टी1डी को समझाने में मदद मिली।

अब जनवरी 2026 पर आते हैं। टी1डी बार्बी की सफलता के बाद 1945 में स्थापित अमेरिकी खिलौना कंपनी मैटल ने ऑटिस्टिक बार्बी लॉन्च की है। पहली बार 9 मार्च 1959 को लॉन्च हुई बार्बी ने लंबा सफर तय किया है। नई ऑटिस्टिक बार्बी में स्टिमिंग के लिए जानबूझकर कोहनी और हाथों के लचीले जोड़ जैसे डिजाइन दिए गए हैं। स्टिमिंग किसी संवेदी जानकारी को समझने के लिए ऑटिस्टिक लोगों के शरीर में बार-बार होने वाले मूवमेंट को कहते हैं।

यह इस बात को दिखाने की कोशिश है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर वाले लोग दुनिया को कैसे महसूस करते हैं। नई बार्बी की एक्सेसरीज में नॉइज कैंसलिंग हैडफोन, ढीले कपड़े और ऑगमेंटेटिव और अल्टरनेटिव कम्युनिकेशन एप्स वाला टॉय टैबलेट है, जैसा कुछ ऑटिस्टिक लोग इस्तेमाल करते हैं।

यह डॉल पिछले 18 महीने मेंं ऑटिस्टिक सेल्फ एडवोकेसी नेटवर्क के साथ मिलकर तैयार की गई है। यह एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है, जिसका उद्देश्य ऑटिस्टिक समुदाय को सशक्त बनाना है। इसके एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर कॉलिन किलिक ने हाल ही में कहा कि ‘युवा ऑटिस्टिक लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उनका सच्चा और खुशी से भरा प्रतिनिधित्व हो, और यह डॉल वैसी ही है।’ इस संगठन ने न सिर्फ टॉय कंपनी से साझेदारी की, बल्कि उनके टूल्स तय करने समेत पूरी डिजाइन प्रक्रिया में मार्गदर्शन भी दिया।

मैटल की एक प्रेस रिलीज में कहा गया है कि चूंकि ऑटिज्म बाहर से दिखने वाली बीमारी नहीं, इसलिए बार्बी की आंखें थोड़ा साइड में देखती बनाई गई हैं। यह दर्शाता है कि ऑटिस्टिक समुदाय के कुछ लोग कभी-कभी सीधे आई कॉन्टैक्ट से बचते हैं। बार्बी ने ढीली पिनस्ट्राइप ए-लाइन ड्रेस और पर्पल मैरी जेन स्टाइल के फ्लैट जूते पहने हैं। ड्रेस ढीली-ढाली है, ताकि त्वचा और कपड़े का संपर्क कम हो और जूते स्थिरता बढ़ाने के लिए हैं।

कंपनी को उम्मीद है कि जब अन्य परिवार इस बार्बी को देखेंगे तो यह एक समाज की दूरी पाटने में मददगार होगी। यह प्रतिनिधित्व के जरिए सहानुभूति और समावेशिता बढ़ाने की कोशिश है। ऐसे खिलौनों की बढ़ती स्वीकार्यता का एक कारण यह है कि ये कई बच्चों के लिए उनकी पहचान का ‘आईना’ बनते हैं। खिलौने के अनुभव के जरिए बच्चे इस सच्चाई को समझते हैं। चूंकि ऑटिज्म और डायबिटीज अकसर बाहर से नजर नहीं आते, इसलिए ये डॉल्स सामान्य या स्वस्थ बच्चों के लिए दुनिया देखने के तरीकों को समझने का जरिया बनती हैं।

समर्थकों का मानना है कि ऐसे कदमों से न सिर्फ सहानुभूति बढ़ती है, जो समझ और विविधता की स्वीकार्यता बढ़ाती है- बल्कि ये भ्रांतियों को दूर करने में भी मददगार हैं। मुझे खुद लगा कि ऐसे खिलौने खासतौर पर माता-पिता और शिक्षकों के बीच जागरूकता बढ़ाने में मदद करते हैं, ताकि वे ऐसी विशेषताएं पहचान सकें।

फंडा यह है कि अब तक खिलौने महज मनोरंजन के लिए बनाए जाते थे। लेकिन वही इंडस्ट्री अब डायबिटीज और ऑटिज्म पीड़ितों के लिए समाधान देने वाली बन रही है, लोगों में जागरूकता फैला रही है और साथ ही बिजनेस के बेहतर अवसर भी बना रही है।

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