एन. रघुरामन का कॉलम:  बुरी जीत से अच्छा है, शान से हार जाएं
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एन. रघुरामन का कॉलम: बुरी जीत से अच्छा है, शान से हार जाएं

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52 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

1960 में दक्षिण अफ्रीका में जन्मे केविन कार्टर रंगभेद युग में पले-बढ़े थे। गोरे होने के नाते उन्होंने विशेषाधिकारों का आनंद लिया, पढ़ाई की और वायुसेना में शामिल हुए। 1980 में भेदभाव का सामना कर रहे एक अश्वेत का बचाव करने पर उन्हें पीटा गया। यह घटना उनकी जाग्रति का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। 1983 में उन्होंने कुछ भयानक बम विस्फोट देखे और हिंसा से खिन्न होकर उन्होंने रंगभेद की भयावहता को उजागर करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

1984 में वे जोहान्सबर्ग स्टार अखबार के फोटोग्राफर बन गए। अगले 10 वर्षों में केविन को विरोध प्रदर्शनों, अंतिम संस्कारों और पुलिस व रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों की तस्वीरें लेने के लिए कई बार गिरफ्तार किया गया।

1993 में कार्टर को सूडान में एक असाइनमेंट मिला। सूखे और गृहयुद्ध से बर्बाद इस देश पर दुनिया के मीडिया ने तब तक बहुत कम ध्यान दिया था। केविन संयुक्त राष्ट्र के एक फूड-कैम्प में पहुंचे। वहां उन्होंने एक बच्ची को देखा, जो अकाल से ग्रस्त होकर मिट्टी में पड़ी थी। उसके बगल में एक गिद्ध लालचपूर्ण-धैर्य के साथ उसके मरने का इंतजार कर रहा ​था।

केविन के शरीर की हर रग उस भयावह दृश्य को देखकर चीख उठी। उन्होंने यंत्रवत ही कैमरा उठाया और अनेक छायाचित्रों में हर कोण से उस बच्ची की पीड़ा को कैमरे में कैद कर लिया। उन्हें इस त्रासदी को दुनिया के सामने लाने वाला भयावह दृश्य मिल गया था।

कुछ खबरों के मुताबिक केविन ने गिद्ध को भगा दिया था और उस कृशकाय बच्ची को उठाकर उसके कानों में फुसफुसाते हुए उसे सांत्वना दी थी कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। फिर उन्होंने बच्ची को बचाव दल को सौंप दिया था। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह तस्वीर उन्हें आजीवन परेशान करेगी।

वापस लौटने पर उन्हें इस तस्वीर के लिए प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। लेकिन प्रशंसा के साथ-साथ आलोचना और पड़ताल भी हुई। कई लोगों ने उनके इरादों पर सवाल उठाए और उन पर अपने निजी मकसद के लिए एक बच्ची की पीड़ा का फायदा उठाने का आरोप लगाया। अप्रैल 1994 में जब केविन को पुलित्जर पुरस्कार मिला तो यह उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होनी चाहिए थी। लेकिन वह पुरस्कार उन्हें अपने उस असहनीय अपराध-बोध की याद दिलाने लगा।

मुझे 1994 में जोहान्सबर्ग में केविन से मिलने का मौका मिला था, जब मैं नेल्सन मंडेला के दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने की घटना को कवर कर रहा था। इसके चार महीने बाद ही केविन ने 33 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली।

उसी साल (1994) और उसी देश (सूडान) से आठ साल के गुओर मारिअल गृह युद्ध के दौरान दक्षिण सूडान के एक शरणार्थी शिविर से भाग निकले थे। एक रात सैनिकों ने उनके घर पर छापा मारा था और एक राइफल के प्रहार से उनका जबड़ा तोड़ दिया था।

वे बेहोश हो गए। बाद में उन्होंने खुद को एक शरणार्थी शिविर में पाया। उनके परिवार के 28 सदस्य मारे गए, लेकिन वे मिस्र भागने में सफल रहे, और फिर 16 साल की उम्र में स्थायी रूप से अमेरिका चले गए। चूंकि वे बचपन से ही सशस्त्र विद्रोहियों से भागते आ रहे थे, इसलिए 28 की उम्र में उन्हें 2012 के लंदन ओलिम्पिक में मैराथन के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिला।

तब सवाल उठा कि वे किस देश का झंडा लेकर चलेंगे? वे अमेरिकी नागरिक नहीं थे और उनकी मातृभूमि दक्षिण सूडान को 2011 में ही एक स्वतंत्र देश का दर्जा मिला था। वह देश ओलिम्पिक में सम्मिलित होने की पात्रता को पूरा नहीं कर पाया था। यही कारण था कि जब गुओर के समक्ष सूडान का झंडा लेकर चलने की पेशकश की गई, तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। क्योंकि सूडान से हुआ गृहयुद्ध ही उनके परिवार की हत्या के लिए जिम्मेदार था।

उन्होंने ओलिम्पिक ध्वज उठाया और वे पहले या तीसरे नहीं, बल्कि 47वें स्थान पर रहे। लेकिन पूरी दुनिया और मीडिया ने उनकी “विजयी’ हार का जश्न मनाया, क्योंकि उन्होंने मात्र एक साल पुराने एक देश को पहचान दी थी।

फंडा यह है कि तय करें हमारे बच्चों को क्या चुनना चाहिए- एक विजयी हार को अपनाना या एक बुरी जीत का आनंद लेना।

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