एन. रघुरामन का कॉलम:  यूएस में थ्योरी क्लास से पहले भारत में प्रैक्टिकल क्लास नया बिजनेस है!
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एन. रघुरामन का कॉलम: यूएस में थ्योरी क्लास से पहले भारत में प्रैक्टिकल क्लास नया बिजनेस है!

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11 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मुंबई के जिस इलाके में मैं रहता हूं, वहां एक महिला ऐसे युवा विद्यार्थियों के लिए कुकिंग क्लास चलाती हैं, जो इस साल पढ़ाई के लिए अमेरिका जा रहे हैं। उसका बुलावा बहुत साधारण है।

अमेरिकी सरकार द्वारा लागू टैरिफ के बाद अमेरिका में खाद्य कीमतें एक नई ऊंचाई को छूने जा रही हैं। और अब वहां कॉलेज फीस के अलावा रहने-खाने के लिए भी ज्यादा पैसे की दरकार होगी। अगर आप भी अपने खर्च में कटौती चाहते हैं, तो महज 15 दिन की क्लास में सादा और सेहतमंद खाना बनाना सीख लें। क्लास के नोटिस बोर्ड पर कई अखबारों की कटिंग्स लगी हैं।

एक खबर में बताया गया है कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध का सबसे बड़ा चावल आयातक देश है। 2016/17 में अमेरिका ने लगभग 787 हजार मीट्रिक टन चावल आयात किया था, जो 2023/24 में बढ़कर लगभग 1.5 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है।

एक अन्य खबर में बताया है कि अमेरिका लगभग 1.5 लाख टन काजू का उपभोग करता है, जिसमें वियतनाम से आने वाला हिस्सा 1.3 लाख टन है। यह वियतनाम से आने वाले काजू पर टैरिफ उजागर करता है और बताता है कि भारत की हिस्सेदारी 7,000-8,000 टन है। एक और रोचक जानकारी उन्होंने पोस्ट की है, तकरीबन 62 विदेशी निर्यातक 119 अमेरिकी खरीदारों को बिरयानी मसाला सप्लाई कर रहे हैं, जो कि बाद में रिटेल मार्केट में बेच देते हैं।

पिछले साल की तुलना में 29% की वृद्धि के साथ बिरयानी मसाले के कुल 549 शिपमेंट्स आयात हुए हैं। इस तरह की पहल का नतीजा ये हुआ है कि उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका या किसी अन्य देश जाने वाले सैकड़ों स्टूडेंट्स अब उनके यहां आकर कुकिंग सीख रहे हैं। गर्मियों में साधारण सूप से लेकर वीकेंड पर बिरयानी तक… क्लास में स्टूडेंट्स को वह सब बनाना सिखाया जा रहा है, जिससे इन युवा बच्चों के माता-पिता के सैकड़ों डॉलर बच सकते हैं।

ऐसे छात्र जो समझते हैं कि खाने-पीने की चीजों की कीमत भारत की तुलना में 10 गुना अधिक है (जब इसे डॉलर से रुपए में बदलें), वे अपनी इच्छा से इस क्लास में शामिल हो रहे हैं और घर पर भी अपनी मां की देखरेख में इसकी प्रैक्टिस कर रहे हैं। यह सिर्फ एक क्लास नहीं है, बल्कि मुंबई के हर उपनगर में विभिन्न समुदायों को ध्यान में रखकर ऐसी क्लासेस चल रही हैं। अमेरिका में अकादमिक सत्र शुरू होने के तीन महीने पहले से ये क्लासेस शुरू हो जाती हैं।

लेकिन इस साल ट्रंप के टैरिफ मुद्दे के बाद से इनकी संख्या दोगुनी हो गई है। अपने कॉलेज या काम के लिए बाहर गए भारतीय छात्र आमतौर पर अपना पसंदीदा भोजन पाने में जद्दोजहद करते हैं। ऐसे में ये क्लासेस उन्हें बुनियादी बातें सिखाती हैं, जैसे कि बिना गैस कनेक्शन के इलेक्ट्रिक कुकर या स्टोव, इलेक्ट्रिक हॉब्स और ओवन पर भारतीय खाना कैसे बनाएं।

इसके अलावा, ये क्लासेस छात्रों की पसंद और उनकी आखिरी लर्निंग के आधार पर उन्हें मसालों की एक विशेष सूची देती हैं, ये सूची उन मसालों की तस्वीर के साथ, उनकी मातृभाषा और अंग्रेजी में होती है। इससे उन्हें यहां से सामान पैकिंग में मदद मिलती है और इस कागज की मदद से अमेरिका के पटेल स्टोर्स (पूरे अमेरिका में सबसे लोकप्रिय स्टोर्स) में खरीदारी करने में भी आसानी होती है।

इन क्लासेस में सिर्फ पांच मुख्य सामग्रियों के साथ, बहुत सारे खाने बनाने के तरीके बताए हैं, ताकि वे कहीं भी हों, घर के खाने का वही स्वाद बरकरार कर सकें।चूंकि खाना बनाना सिर्फ जीवित रहने की कला भर नहीं है, बल्कि यह उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहने में भी मदद करती है और इस बहाने बच्चे रोज अपने माता-पिता को वीडियो कॉल कर लेते हैं। इससे अप्रत्यक्ष रूप से उनके माता-पिता को भी शांति मिलती है, क्योंकि मां हमेशा चिंतित रहती है कि बच्चे वहां क्या खा रहे हैं।

फंडा यह है कि अगर आपके आसपास स्टूडेंट्स की ऐसी आबादी है, जो कि भारत के मेट्रो शहरों में या अन्य देशों में जा रही है, तो उन्हें कुकिंग जैसे सर्वाइविंग स्किल की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी गृहिणियों के लिए नया बिजनेस आइडिया है। इस बारे में सोचें।

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