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मध्य प्रदेश में चंदेरी के एक शांत और धूलभरे गांव में जिंदगी बहुत धीमी और मुश्किल थी। यहां रहने वाले परिवार खेतों में काम करके गुजारा करते थे और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं में ही भरोसा करते थे। इन्हीं में से एक था साक्षी का परिवार। उनके खानदान में कोई चौथी से आगे नहीं पढ़ा। पीढ़ियों से उनके लिए जीवन का मतलब अक्षर नहीं, बल्कि शारीरिक मेहनत थी। उसके पिता पढ़-लिख नहीं सकते थे और मां पूना बाई अगले वक्त का खाना जुटाने के लिए दिन-रात मेहनत करती थीं। शिक्षा उनके लिए दूर की कौड़ी थी- ऐसी लग्जरी, जो सिर्फ अमीरों के लिए थी। साक्षी जब छोटी ही थी तो फसल खराब होने और अत्यंत गरीबी ने परिवार को एक जोखिमभरा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। वे अपना एकमात्र घर छोड़ कर सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर के शोर-शराबे से भरे महानगर नई दिल्ली आ गए। इस उम्मीद में कि बड़ा शहर उन्हें नई शुरुआत देगा, वे ऐतिहासिक लाल किले के पास भीड़ भरी झुग्गी में रहने लगे। लेकिन यहां एक अलग मुश्किल आ गई। दिल्ली आने के कुछ ही समय बाद साक्षी के पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए और वर्षों तक काम नहीं कर पाए। रोजी-रोटी की जिम्मेदारी पूरी तरह मां पूना बाई पर आ गई। वे परिवार का पेट पालने के लिए घरों में बर्तन धोकर दस हजार रुपए महीने कमाती थीं। राजधानी की भीड़भाड़ भरी गलियों में साक्षी का बचपन यूनिफॉर्म, स्कूल बैग और किताबों के बगैर ही बीता। क्लासरूम तब तक उसके लिए पहुंच से बाहर था, जब तक कि 2022 की एक दोपहर ने उसकी किस्मत हमेशा के लिए बदल न दी। एक धूल भरी पार्किंग से गुजरते हुए टीनएजर साक्षी ने एक अनोखा दृश्य देखा। खुले आसमान के नीचे बच्चे कतार में बैठे थे। उनके सामने दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल थान सिंह खड़े होकर एक कामचलाऊ स्कूल चला रहे थे, जिसे ‘थान सिंह की पाठशाला’ कहते हैं। साक्षी रुककर देखने लगी। उसकी उत्सुकता देखकर थान सिंह ने कुछ ऐसा किया, जो पहले किसी ने नहीं किया था- उन्होंने साक्षी को किताब थमा दी। उसी फुटपाथ पर खाकी वर्दी वाले उस इंसान ने साक्षी को पहली बार अक्षर सिखाए। साक्षी की लगन देख कर वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने साक्षी का सीधे सातवीं कक्षा में दाखिल भी करा दिया। उसे किताबें और अन्य सहायता भी दिलाईं, जिनकी उसे बहुत जरूरत थी। यह बदलाव साक्षी के लिए डरावना था। वह अपने सहपाठियों से कई साल पीछे थी और खासकर गणित उसे बहुत मुश्किल लगता था। अंक उसे किसी ऊंची दीवार जैसे लगते थे। लेकिन उसने हालात को खुद पर हावी नहीं होने दिया। परिवार के छोटे और तंग कमरे के एक कोने में, जहां एक ही बल्ब जलता था, साक्षी ने अपनी दुनिया बना ली। प्लास्टिक की मिल्क क्रैट उसकी बुकशेल्फ और लकड़ी का एक सपाट टुकड़ा स्टडी डेस्क बन गया। हर दिन घर लौटकर वह सीधे उसी कोने में बैठ जाती और देर रात तक पढ़ाई करती। उसकी अथक मेहनत रंग लाई। हाल ही में दसवीं बोर्ड परीक्षा के नतीजों में साक्षी अपने परिवार के इतिहास में यह महत्वपूर्ण परीक्षा पास करने वाली पहली लड़की बन गई। अशिक्षा का चक्र तोड़ने के बाद साक्षी तुरंत लाल किले के समीप उसी पार्किंग में लौट आई। अब 18 साल की साक्षी दूसरी तरफ बैठकर शिक्षक के तौर पर छह-सात साल के बच्चों को पढ़ाती है। पढ़ाते-पढ़ाते उसने अपने गणित के डर पर भी काबू पा लिया। जब वह अपने उत्साही छात्रों को देखती है, तो उनमें उसे अपना बचपन नजर आता है। वह जानती है कि इन बच्चों को शुरुआत से सही मार्गदर्शन मिल रहा है तो उनका भविष्य उज्ज्वल है। अपनी जिंदगी बदलने वाले पुलिस अधिकारी से प्रेरित होकर साक्षी अब अपने लकड़ी के डेस्क पर बैठकर एक नया सपना देख रही है : सिविल सर्विस परीक्षा पास कर आईपीएस अधिकारी बनना। फंडा यह है कि आपके मौजूदा हालात आपकी अंतिम मंजिल तय नहीं करते। असली सशक्तीकरण तब आता है, जब आप अपनी सफलता का उपयोग कर पीछे आने वालों का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
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