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- N. Raghuraman’s Column A Seed Of Goodness Sown In The Morning Can Become A Tree By Night
2 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मुम्बई से अमृतसर जाने के लिए मैं शनिवार तड़के 4 बजे एयरपोर्ट की सुरक्षा जांच संबंधी लाइन में खड़ा था। अमेरिका से आई मेरी कजिन और चेन्नई में रहने वाले उसके माता-पिता श्रीहरमिन्दर साहिब की यात्रा करना चाहते थे और वाघा-अटारी बॉर्डर पर बीटिंग रीट्रीट भी देखना चाहते थे। चूंकि मेरे लिए यह सुबह से शाम तक की एक दिन की यात्रा थी, इसलिए मेरे पास लगेज नहीं था।
मैंने अपनी कलाई घड़ी, पर्स और मोबाइल एक प्लास्टिक बैग में डाल कर ट्रे में रख दिए, जिसमें कुछ और सामान भी था। इसे रखने से पहले मैंने सीआईएसएफ जवान से पूछा कि ‘चलेगा क्या?’ उसने कुछ सेकंड मेरी ओर गौर से देखा और तपाक से कहा ‘आपका है, इसलिए चलेगा’। उसके ऐसा कहते ही अन्य यात्रियों की नजरें मेरी ओर घूम गईं, जैसे वह चुपचाप पूछ रही हों कि ‘ये कौन है।’ मैंने जवान से हाथ मिलाया और कहा ‘ऐसी सकारात्मकता के साथ मेरा दिन शुरु करने के लिए आपका धन्यवाद।’‘
आपका है, इसलिए चलेगा’ इस सामान्य से वाक्य ने मुझे बेहद गर्व से भर दिया और इसने मुझे किसी ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए मजबूर किया, ताकि इस गर्व का थोड़ा-सा हिस्सा मैं उसे ट्रांसफर कर सकूं। जैसे ही मैं बोर्डिंग गेट पर पहुंचा, मैंने एक युवा मां को देखा जो अपनी छह वर्ष की बच्ची के साथ कनाडा से अमृतसर जा रही थी। मां अपनी बच्ची से कह रही थी कि वह उसे अपने बालों को संवार कर चोटी करने दे।
लेकिन नींद में भरी बच्ची इंकार कर रही थी। मैं वहां गया और बच्ची से कहा ‘वाह, आपके कितने सुंदर बाल हैं, मुझे यह बहुत पसंद हैं।’ इतना सुनते ही उसकी नन्हीं सी आंखों में चमक आ गई और वह झट से चोटी बनवाने के लिए मां की ओर पीठ करके बैठ गई। फिर विमान में मां ने मुझे इस तारीफ के कारण बच्चे के व्यवहार में हुए चमत्कार के लिए धन्यवाद कहा।
जैसे ही मैं अमृतसर पहुंचा वहां एक दुर्घटना हो गई। मेरी 72 वर्षीय आंटी वॉशरूम में गिर गईं, उनके होंठ बुरी तरह से फट गए, जिसके कारण हमें प्लास्टिक सर्जन की मदद लेनी पड़ी। जो कार हमें श्रीहरमिन्दर साहिब और वाघा-अटारी बॉर्डर ले जाने और वापस लाने के लिए आई थी ,उसी से हम लिवासा अस्पताल पहुंचे। मेरे सहकर्मी विक्रमजीत ने हमारे स्वास्थ्य संवाददाता रंजन गोसाईं को सहायता के लिए अनुरोध किया। रंजन ने तुरंत स्थिति संभाली।
युवा, शांत और बेहद पेशेवर प्लास्टिक सर्जन डॉ. अमितेश्वर सिंह के कहने पर रंजन ने कई बार चक्कर लगाए और अपनी जेब से पैसे खर्च कर दवाएं, टांके लगाने का सामान लेकर आए। रंजन मेरे साथ वहीं रुके और उन्होंने हमसे यह भी पूछा कि चूंकि आप लोग सुबह जल्दी घर से निकले हो, इसलिए वह नाश्ते का इंतजाम भी कर सकते हैं।
डॉ. सिंह ने आंटी को आराम की सलाह दी थी, इसलिए रंजन ने तत्काल एक होटल बुक करने में भी हमारी सहायता की, जो पहले हमारे यात्रा प्लान में नहीं था। रात के 10 बजे वापसी की फ्लाइट के वक्त मैं थका और भूखा भी था और सोना चाहता था। मेरे बगल की सीट पर बैठी महिला ने मुझसे दो लाइन आगे बैठे अपने बच्चे से सीट बदलने का आग्रह किया, ताकि वह अपने साथ लाए खाने में से उसे खिला सके। सामान्य तौर पर मैं अपनी पेड सीट नहीं छोड़ता।
लेकिन सुबह से मिले अच्छे अनुभवों के कारण मैंने अपनी सीट 15 वर्ष के उस बच्चे को दे दी। उड़ान के तीस मिनट बाद वह महिला अमृतसरी कुलचा और स्वादिष्ट चने-मसाले से भरी प्लेट लेकर मेरे पास आईं, जो उन्होंने खुद पकाया था।
यकीन मानिए कि यह सिर्फ खाना नहीं था, बल्कि उसमें श्रीहरमिन्दर साहिब के श्रद्धालुओं के ‘लंगर’ जैसा जायका था। मुझे लगा कि जैसे गुरु खुद कह रहे हैं कि ‘क्या हुआ, जो तुमने मेरे दर्शन नहीं किए।’ तुमने मेरे भक्तों की देखभाल की है, जो रविवार को मुझसे मिलने आ रहे हैं। मेरी ओर से यह प्रसाद स्वीकार करो।’ इस भावना से मेरी आंखें नम हो गईं।
फंडा यह है कि सुबह बोए गए अच्छाई के एक बीज में रात तक एक पेड़ बनने की क्षमता होती है। दिन की शुरुआत कुछ अच्छाई के साथ करिए और फिर अपने भीतर आए बदलावों को देखिए और उस बदलाव पर भी गौर करिए, जो आप समाज में लेकर आए हैं।








