एन. रघुरामन का कॉलम:  हमारी दुनिया बिना शिक्षकों वाले स्कूलों के युग में प्रवेश कर रही है
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एन. रघुरामन का कॉलम: हमारी दुनिया बिना शिक्षकों वाले स्कूलों के युग में प्रवेश कर रही है

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5 घंटे पहले

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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

परंपरागत शिक्षकों के बिना चलने वाले स्कूलों का दौर अब आ चुका है। मैसाचुसेट्स के बोस्टन स्थित अल्फा स्कूल में आपका स्वागत है, जो इसी अकादमिक सत्र से खुलने जा रहा है। ‘अल्फा’ नाम जानबूझकर चुना गया है, ताकि यह स्कूल के मुख्य छात्रवर्ग ​को दर्शा सके, जो 2010 से 2024 के बीच जन्मी जनरेशन यानी अल्फा का हिस्सा हैं।

पहली बार स्कूली व्यवस्था में दाखिल हो रहे ये बच्चे इतिहास की डिजिटल तौर पर सबसे दक्ष पीढ़ी माने जाते हैं। इनके बाद आएगी ‘जनरेशन-बीटा’ (2025-2039 के बीच जन्मे), जिनके बारे में माना जाता है कि वे ऐसी दुनिया में रहेंगे, जहां एआई रोजमर्रा के हर काम का अभिन्न हिस्सा होगा।

अगर सोच रहे हैं कि ऐसे स्कूल में सामान्य दिन कैसा होता है, तो आप पेंसिल छीलने, रबर खोने या शिक्षक की बात सुनने की चिंता छोड़ सकते हैं। स्कूल में हर छात्र के पास एक लैपटॉप है, जिसमें एक समर्पित एआई ट्यूटर होता है। पढ़ाई हर छात्र की अपनी गति और स्तर के अनुसार होती है, जहां पारंपरिक शिक्षक की जगह ‘गाइड्स’ होते हैं। ये गाइड्स निर्देश देने की जगह छात्रों की प्रगति पर नजर रखते हैं।

बोस्टन में कैम्ब्रिज स्ट्रीट पर स्कूल की पहली शाखा किंडरगार्टन से 8वीं तक के 25 छात्रों के छोटे समूह से शुरू होगी। अगले साल यह क्षमता 50 करने की योजना है। फीस 55 हजार डॉलर सालाना होगी। बोस्टन स्कूल समिति ने अभी इस प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी नहीं दी है और सवाल उठाए हैं कि क्या यह मॉडल सामान्य छात्रों की जरूरतों को प्रभावी तरीके से पूरा करता है।

हालांकि, कई लोगों का मानना है कि अंततः समिति मंजूरी दे देगी, क्योंकि इस प्रोग्राम को ट्रम्प प्रशासन का मजबूत समर्थन है। बच्चों को इस शिक्षक-रहित स्कूल में दाखिला दिलाने के इच्छुक पैरेंट्स का तर्क है कि अल्फा मॉडल में बच्चे पारम्परिक संस्थानों की तुलना में बहुत तेजी से पढ़ाई पूरी कर सकते हैं। वे इस सिस्टम को सेल्फ-पेस्ड बताते हैं, जो बच्चों को उनके बौद्धिक स्तर के अनुसार सिखाता है।

यह बच्चों को सहपाठियों से नहीं, बल्कि खुद के ही पिछले बेहतरीन प्रदर्शन से प्रतिस्पर्धा के लिए प्रेरित करता है। समर्थकों का दावा है कि इससे ‘सेल्फ-डायरेक्शन’ और ‘रेजिलिएंस’ जैसे वास्तविक जीवन-कौशल विकसित होते हैं। इस नए ढांचे में ‘शिक्षक’ यानी एआई को हर छात्र की जरूरत के अनुसार कस्टमाइज किया गया है। यह उस मूल धारणा को चुनौती देता है कि सीखने के लिए इंसानी शिक्षक चाहिए।

इसकी जगह विचार यह है कि बच्चे खुद अपनी शिक्षा यात्रा के प्रोएक्टिव लीडर बन सकते हैं। छात्र गणित, विज्ञान और सोशल स्टडीज के लिए विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं, जबकि कमरे में मौजूद गाइड्स के लिए पारंपरिक शैक्षणिक योग्यता भी जरूरी नहीं है। इस अपारंपरिक तरीके के बावजूद स्कूल स्टेट करिकुलम फ्रैमवर्क का पालन करता है और आवश्यकता पड़े तो किसी छात्र की व्यक्तिगत जरूरत के मुताबिक रीडिंग स्पेशलिस्ट जैसे विशेष स्टाफ की नियुक्ति भी करता है।

शायद इस व्यवस्था का सबसे खास पहलू यह है कि कैसे एआई हर बच्चे को व्यक्तिगत तरीके से चुनौती देता है। अब पूरी कक्षा एक समय पर एक ही असाइनमेंट से नहीं जूझती, न छात्रों में सबसे पहले काम खत्म करने की होड़ होती है। इसके बजाय सॉफ्टवेयर हर यूजर के मुताबिक खुद को ढाल लेता है।

हालांकि कई पैरेंट्स स्क्रीन टाइम बढ़ने पर चिंता जताते हैं, लेकिन अकसर वे उद्देश्यहीन सोशल मीडिया उपयोग और निगरानी में किए जा रहे प्रोडक्टिव स्कूल वर्क के बीच अंतर को समझ कर संतुष्ट हो जाते हैं।

स्कूल प्रशासन का दावा है कि एआई से छात्र पूरे दिन के अकादमिक कार्य को महज दो घंटे में ही पूरा कर लेते हैं, जिससे दिन का बड़ा हिस्सा फिजिकल एजुकेशन और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों के लिए बचता है। इसके दीर्घकालीन प्रभावों को छोड़ें तो फिलहाल यह साफ है कि स्कूली शिक्षा का नया दौर आ चुका है।

फंडा यह है कि हमें खुद को ऐसी जिंदगी के लिए तैयार करना होगा, जहां तकनीक इंसानी अनुभव में बड़ी भूमिका निभाएगी। जैसे-जैसे हमारा पारंपरिक ढांचा पलट रहा है, लगता है कि परिवारों में शिक्षा ही वह पहला अहम स्तंभ है, जो पूरी तरह बदलने जा रहा है।

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