नंदितेश निलय का कॉलम:  आज दुनिया को ‘आध्यात्मिक लीडरशिप’ की बहुत जरूरत है
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नंदितेश निलय का कॉलम: आज दुनिया को ‘आध्यात्मिक लीडरशिप’ की बहुत जरूरत है

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3 घंटे पहले

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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक - Dainik Bhaskar

नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक

क्या दुनिया में अनवरत चल रहे संघर्ष हमें कुछ सीख भी दे रहे हैं? शायद हां! इन संघर्षों ने सबसे बड़ा सबक तो यही दिया है कि इस दुनिया को सिर्फ लीडर्स नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे लीडर्स चाहिए जो आध्यात्मिक मेधा से लैस हों। और इस यकीन से भी भरे हों कि राष्ट्र की शक्ति सिर्फ कृत्रिम मेधा से नहीं, बल्कि वैसे नेतृत्व से आती है, जो लीडर को जन-जन तक आध्यात्मिक शक्ति को पहुंचाने की जिम्मेदारी भी देता है।

युवाल नोआ हरारी बताते हैं कि 21वीं सदी में आध्यात्मिकता पहले से कहीं ज्यादा जरूरी इसलिए है, क्योंकि बहुत सारे आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रश्न इस दौर में अचानक व्यावहारिक सवाल बनते जा रहे हैं। उनके अनुसार, आज युद्ध के संकट के बीच वह सारे प्रश्न जो कभी दर्शन की ओर मुखातिब थे, अब खासे महत्वपूर्ण हो चुके हैं और हमें एक ऐसे मोड़ पर पहुंचा रहे हैं, जहां इंसान खुद इंसानों को फिर से डिजाइन कर सकते हैं।

आज आध्यात्मिक लीडर्स की इस दुनिया को सबसे ज्यादा इसलिए जरूरत है, क्योंकि दुनिया फिर से यह पूछने लगी है कि बम स्कूलों पर क्यों गिरते हैं, गरीब और गरीब क्यों होते जा रहे हैं, फ्री-विल क्या होती है, इंसान होने के मायने क्या हैं और इंसानियत क्या है?

हरारी इस बात को सीधे उन कंपनियों से जोड़ते हैं, जो हमारे भविष्य को आकार दे रही हैं। वे यह कहते हैं कि टेक-कंपनियों को भी सचमुच दार्शनिकों की जरूरत है। उन्हें आध्यात्मिकता के जानकारों की दरकार है, ताकि वे समझ सकें कि वे आखिर क्या कर रहे हैं। आध्यात्मिक नेतृत्व ही उस भरोसे को स्थापित करता है, जो आज के संसार में दिनों-दिन टूटता जा रहा है।

सबसे बड़ी सीख इन युद्धों ने यह दी है कि तमाम संधियों और समझौतों के बावजूद राष्ट्रों के बीच वह भरोसा नहीं रहा। जिस आर्थिक निर्भरता पर दुनिया टिकी थी, वह भी युद्धों को नहीं रोक पाई और तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी युद्ध को रोकने में नाकाम रहीं, क्योंकि वो लीडर्स नहीं पाए गए, जो आध्यात्मिक लीडरशिप का नेतृत्व कर रहे हों। उस खोए हुए भरोसे को वापस सिर्फ वैसा नेतृत्व ला सकता है, जिसकी छवि में कोई छिपा हुआ युद्ध न हो, कोई झांकती क्रूरता न हो, बल्कि वह शांति और साधना का नायक हो, जो दुनिया को बचाने का हरसम्भव प्रयास करे।

हमें आज वैसे “स्पिरिचुअल कोशेंट’ की जरूरत है, जो दुनिया को बचाने का हरसम्भव प्रयास करे। और इस संसार को कोई पक्ष और विपक्ष न बनने दे। आज एक तरफ तो एआई से मनुष्यता को बचाने की जद्दोजहद है, वहीं दूसरी ओर आमजन के बीच नेतृत्व के प्रति वह भरोसा भी टूटता जा रहा है, जो किसी समाज और देश को बनाता भी है और बचाता भी।

तमाम राष्ट्र मानो कोई राजनीतिक अखाड़ा बनते जा रहे हैं, जहां कोई भी संबंध या पहचान इस बात पर टिकी होती है कि किसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता क्या है? कौन पक्ष में है तो कौन विपक्ष में? पश्चिमी एशिया के संघर्ष में भी यही देखने को मिला कि अपना हित साधने के लिए संसार के देश हथियार तो बेच सकते हैं, लेकिन युद्ध को रोकने की कोई कोशिश नहीं करना चाहते। क्योंकि वहां भी तमाम राष्ट्रों के बीच एक पक्ष-विपक्ष बन चुका होता है।

दुनिया को ऐसे लीडर चाहिए, जो प्रेम और सौहार्द के साथ जीना सिखाएं। लीडर के शब्दों और आचरण पर जनता भरोसा करती है। अगर वह युद्ध सम्प्रेषित करता है तो जनता भी वही समझती है और अगर उसके संवाद में शांति और जीवन का भाव है तो समाज भी वैसा ही बनने लगता है।

आध्यात्मिक लीडरशिप जनता को आत्मिक शक्ति से लैस करती है। वह नेतृत्व को उस अहंकार से बचाती है, जो दुनिया को हथियारों से जीतना चाहता है और कभी न खत्म होने वाले संघर्षों में झोंक देता है। जिसमें पश्चाताप तक की गुंजाइश नहीं होती। कोविड के बाद युद्धों में डूबी दुनिया अब उस आध्यात्मिक लीडरशिप को आवाज दे रही है, जो हमें जीवन के होर्मुज से सुरक्षित निकाल पाने में सक्षम हो!

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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