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- Shekhar Gupta’s Column: It Has Become Imperative That We Protect Our Eastern Seas
1 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
कल जब ऑपरेशन सिंदूर की पहली सालगिरह मनाई जाएगी तो हमें उन 87 घंटों में भारतीय सेना के पराक्रम की कई कहानियां सुनने-पढ़ने को मिल सकती हैं। लेकिन हमें यह विचार भी करना चाहिए कि भविष्य में हमें किस तरह की लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। हमें पश्चिम से पूरब तक फैले अपने भौगोलिक विस्तार पर नजर डालनी चाहिए।
फिलहाल हमारी पूर्वी सीमा पर शांति दिखती है, लेकिन यह स्थिति बदल सकती है। याद रहे कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने 9 अगस्त 2025 को फ्लोरिडा में दिए अपने भाषण में क्या दावे किए थे।
उन्होंने कहा था कि अगली बार पाकिस्तान पूर्वी मोर्चे से लड़ाई शुरू करेगा क्योंकि वहीं भारत ने अपने कीमती संसाधन स्थापित किए हैं! अब जरा नक्शा खोलकर उस क्षेत्र पर नजर डालिए। आपको हमारे 3,416 किमी लंबे पूर्वी समुद्री तट पर क्या दिखता है?
वहां बंगाल की खाड़ी के साथ सटी बांग्लादेश की 600 किमी लंबी समुद्री सीमारेखा है, उसके बाद म्यांमार की 2,227 किमी लंबी समुद्री सीमारेखा है। फिर थाईलैंड है। इससे दक्षिण में अंडमान सागर आपको मलक्का स्ट्रेट से होकर प्रशांत महासागर में पहुंचा देता है। इनमें से बांग्लादेश और खासकर म्यांमार चीन के दबदबे में आ सकते हैं।
और अगर कभी, किसी स्थिति में थाईलैंड ने “क्रा इस्थमुस’ की सबसे संकरी 50 किमी भूमि पट्टी पर, जहां उसकी दक्षिणी सीमा मलय प्रायद्वीप से जुड़ती है, नहर खोदने के अपने इरादे को अमली जामा पहनाने का फैसला किया, तब जहाजों को प्रशांत महासागर से अंडमान सागर में पहुंचने का समय तीन दिन घट जाएगा।
इसके अलावा, यह रणनीतिक दृष्टि से एक दबाव-क्षेत्र के रूप में मलक्का स्ट्रेट की हैसियत को कमजोर कर देगा। इस इरादे को हकीकत बनाने पर 55 अरब डॉलर का खर्च आएगा, जो इसे एक कपोल कल्पना जैसा बना देता है, लेकिन इसमें काफी संभावनाएं भी हैं। तभी तो यह विचार पिछले 350 वर्षों से कायम है।
यह विचार अक्टूबर 2023 में तब चर्चा में आया था, जब थाईलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रेत्थ थाविसिन ने बीजिंग में ‘बीआरआई’ के मंच पर इसका अनमने ढंग से जिक्र किया था और यह कैमरों में दर्ज हो गया था।
इसके बाद, आप यह सोचने में देर नहीं करेंगे कि अगर यह प्रोजेक्ट कभी वास्तविकता में बदला तो यह चीन की मदद से ही होगा और हो सकता है कि चीन उसका मालिक भी बन जाए। यह भारत के व्यस्त पूर्वी समुद्र तट, उसके किनारे बसे महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों को चीन के निशाने पर ला देगा। प्रशांत महासागर खतरनाक रूप से भारत के नजदीक आ जाएगा।
इतिहास बताता है और यह स्वाभाविक भी रहा है कि भारत को पाकिस्तान और चीन से पश्चिम तथा उत्तर की ओर से खतरा पेश आता रहा है। पूरब पर कम ध्यान दिया गया है। ‘क्वाड’ की, और मलक्का जलडमरूमध्य की वजह से हासिल बढ़त की भी काफी चर्चा होती रही है, लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भारत पूरब को लेकर आश्वस्त रहा है।
यही वजह है कि हमारी थलसेना और वायुसेना उत्तर और पश्चिम पर ही नजर रखती रही है। यहां तक कि नौसेना का ध्यान भी पश्चिम पर ही रहा है। भूगोल ने भारत को अपनी सुरक्षा के लिए वह सब कुछ दिया है, जिसकी उसे जरूरत है। पूरब में अंडमान निकोबार द्वीप ऐसे विमानवाहक युद्धपोतों की तरह हैं, जिन्हें कभी डुबाया नहीं जा सकता। वे जहाजों, पनडुब्बियों, लड़ाकू तथा टोही विमानों के अड्डे बन सकते हैं।
लंबी रेंज और ईंधन भरने की सुविधा के बूते भारत पूरी बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और उससे आगे तक पर नजर रख सकता है। यह ग्रेट निकोबार द्वीप को हमारे दक्षिण का आखिरी क्षेत्र बना देता है, जो अनूठी रणनीतिक थाती बन जाती है। राहुल गांधी वहां बहुद्देशीय नगर एवं बंदरगाह के निर्माण का विरोध करने गए थे। दरअसल, वहां विशाल सैन्य अड्डा बनाने की योजना है।
यह योजना चीन को मलक्का जलडमरूमध्य में रोकने की संभावना के गलत आकलन में उलझ गई है। मलक्का स्ट्रेट इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर जैसे ताकतवर स्वतंत्र देशों के बीच स्थित है। इसे बंद करने के लिए भारत को उसी तरह लापरवाह होना पड़ेगा, जिस तरह ईरान होर्मुज के मामले में है, क्योंकि यह दोस्तों और दुश्मनों- जापान, दक्षिण कोरिया और रूस भी को बाधा पहुंचाएगा।
भारत इतना जोखिम तभी उठा सकता है, जब वह सचमुच में हताशा की स्थिति में पहुंच जाए। इसलिए, देश के कवच के रूप में द्वीपों, खासकर ग्रेट निकोबार पर नजर रखना ज्यादा आसान है। अगर इन्हें बुद्धिमानी और धैर्य के साथ विकसित किया जाए तो ये पूर्वी भारत को वैसी ही सुरक्षा दे सकते हैं, जैसी हिमालय उत्तर भारत को दे रहा है। यह परियोजना अब शुरू हो गई है। सोचें अगले 10-15 साल में क्या कुछ नया उभर सकता है?
- आज जब सत्ता-समर्थक सोशल मीडिया पर बांग्लादेश के खिलाफ गुस्सा और उस पर अविश्वास चरम पर है, तब मैं बस इतना ही कहूंगा कि पूरब के बारे में सोचिए, पूर्वी समुद्रतट के बारे में विचार कीजिए और अपनी ताकत बढ़ाते हुए उन द्वीपों पर नजर रखिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









