`एन. रघुरामन का कॉलम:  हमारे ठंडे स्थान गर्म द्वीपों में क्यों बदलते जा रहे हैं?
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`एन. रघुरामन का कॉलम: हमारे ठंडे स्थान गर्म द्वीपों में क्यों बदलते जा रहे हैं?

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मैं आठ साल का था, तब मुझे कावेरी नदी के बारे में बताया गया कि कर्नाटक के कोडागु जिले के पश्चिमी घाट में तलाकावेरी नामक जगह पर इसका उद्गम है। मुझे बताया गया कि यह नदी कर्नाटक के दक्कन के पठार से 320 किमी यात्रा करने के बाद तमिलनाडु में दाखिल होती है और फिर यहां से 416 किमी बहते हुए तमिलनाडु के मयिलादुथुराई जिले के पास पूम्पुहार में बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।

हालांकि हमारे पास कावेरी बेसिन के पूरे 700 किमी की यात्रा करने के लिए पैसे नहीं थे, लेकिन हमने इसके मुहाने से पहले, विपरीत दिशा में दस गांवों की यात्रा की। इनमें एक कुंभकोणम भी था, जो कि दक्षिण भारत में मंदिरों का शहर कहा जाता है और मेरा जन्मस्थान भी है।

साइकिल पर उन यात्राओं के दौरान मेरे अंकल अक्सर रुकते और उन्हें अगर बच्चे नदी किनारे पेशाब करते दिख जाते, तो वे उन्हें डांटते और उनके माता-पिता को चेतावनी देते। वे नदी के किनारों की सफाई करते हुए समाजसेवा भी करते।

इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को जल स्रोतों के महत्व और उन्हें प्रदूषित करने के खतरों के बारे में संवेदनशील बनाना था। इन छह दशकों में, अपनी सालाना यात्रा के दौरान हर बार मैंने महसूस किया है कि यह सदाबहार नदी धीरे-धीरे मर रही है और कुंभकोणम तक नहीं पहुंचती।

बचपन की ये यादें तब याद आ गईं, जब मैंने पुणे स्थित नागरिक समूह जलदिंडी प्रतिष्ठान के बारे में सुना। ये समूह पावना नदी की दुर्दशा के बारे में स्थानीय बच्चों को जागरूक करने के लिए हर साल एक ट्रिप कराता है। पावना, पश्चिमी घाट से निकलती है और 24 किमी यात्रा करके पुणे के पास पिंपरी चिंचवाड़ तक पहुंचती है।

पिंपरी चिंचवाड़ के लगभग 80% लोगों को इसी नदी से पीने का पानी मिलता आ रहा है। लेकिन पिछले दो वर्षों से, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कमी, अनियंत्रित औद्योगिक व घरेलू अपशिष्ट ने इस नदी को देश की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक बना दिया है।

आज ये जलकुंभी, कूड़े, बेजान मछलियों से भरी हुई है। इस महत्वपूर्ण संसाधन को बचाने में अधिकारी विफल हैं, ऐसे में इस समूह का मिशन बच्चों को प्रेरित करना है, ताकि वे नदी के संरक्षक बनें। पावना के खात्मे से राजीव भावसार और उनकी टीम चिंतित है। राजीव कहते हैं, ‘हर साल, प्रदूषण के कारण नदी एक और किलोमीटर मर रही है, और हम इसके लिए कुछ नहीं कर रहे हैं।’

सवाल है कि क्या नदियां खत्म हो रही हैं, इसीलिए तापमान बढ़ रहा हैै? ये कई कारणों में से एक है। एक समय, पहाड़ी इलाके ठंडी जलवायु के लिए जाने जाते थे, वजह इनकी ऊंचाई और हवा के बहाव के अनुकूल ढलानें थी, पर अब स्थितियां उलट हैं। हैदराबाद के जुबली हिल्स का उदाहरण लें।

ये इलाका रईसों के आवास के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने यहां के ठंडे मौसम के कारण दशकों पहले ये जगह चुनी। समुद्र तल से ऊंचाई वाले यही इलाके, जहां कभी गर्मी ठहरती नहीं थी, पर अब चारों ओर से ऊंची इमारतों से घिरे रहने के कारण और कंक्रीट की सड़कें, कांच की इमारतों के चलते यहां से गर्मी बाहर वातावरण में नहीं निकल पा रही है।

गर्मी को रोकने वाली सामग्री का उपयोग, घने निर्माण की अनुमति और छिटपुट ट्री कवर को लेकर कोई चिंतित नहीं है, जिसके चलते ये पॉश इलाके अपने ही इंफ्रास्ट्रक्चर की आग में तप रहे हैं। आईआईटी भुवनेश्वर के अध्ययन में कहा गया है कि बदले शहरी परिदृश्य को अब वाष्पीकरण से मिलने वाली ठंडक का कोई फायदा नहीं मिलता, बल्कि उच्च-थर्मल-इनर्शिया वाली सतहें (जो कि गर्मी को सोख नहीं पाती) व गर्मी के पार्टिकल्स की हीट एनर्जी भी नहीं निकल पाती, जिससे अर्बन हीट आयलैंड इफेक्ट पैदा हो रहा है।

जब तक हम गिरते ग्रीन कवर को रोकने, नदियों व झीलों को सूखने से बचाने के लिए कुछ नहीं करते और मशरूम की तरह पनपते कंक्रीट के जंगलों पर कड़ी नजर नहीं रखते, तब तक इन ठंडे स्थानों पर खतरा मंडराता रहेगा।

फंडा यह है कि समय आ गया है कि हम अगली पीढ़ी को यह सिखाएं कि ज्यादा से ज्यादा ग्रीन कवर उगाना और अपने जल स्रोतों की रक्षा करना ही एकमात्र रास्ता है। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे पूर्वजों ने नदियों को अक्सर देवतुल्य मानकर पूजा। उस विश्वास को हमें फिर से लाना होगा।

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