एन. रघुरामन का कॉलम:  हर भारतीय पर्व हमें अनुशासन जरूर सिखाते हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: हर भारतीय पर्व हमें अनुशासन जरूर सिखाते हैं

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12 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

1950 के दशक के उत्तरार्ध में जब मेरी मां का विवाह हुआ, तब दस ग्राम सोने की कीमत मात्र 60 रु. थी और कुछ समय पहले जब मेरी बेटी का विवाह हुआ, तब कीमत 60 हजार रुपए के आसपास थी। चंद सालों पहले, अपने नाना से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने बताया था कि मां की शादी के समय उनकी तनख्वाह भी 60 रु. थी।

और उस वेतन के साथ वह सोच-विचार में थे कि बेटी की शादी कैसे करेंगे। और तब उनकी पत्नी यानी मेरी नानी ने उन्हें ये कहते हुए चौंका दिया कि मेरी मां के जन्म के बाद हर अक्षय तृतीया पर वह थोड़ा-थोड़ा सोना खरीदती रहीं, जिसके चलते शादी के खर्चों का बोझ काफी हद तक कम हो गया।

बाकी खर्चों को लेकर वह चिंतित नहीं थे, क्योंकि उस समय की परंपराओं के अनुसार गांव में अगर किसी बेटी की शादी होती थी, तो पूरा गांव एकजुट होकर अपना शक्ति प्रदर्शन करता था। केले की खेती करने वाले परिवार शादी में भोजन के लिए केले के पत्ते और केले देते थे।

वहीं घर के बाड़े में बांस के पेड़ लगाने वाले परिवार बांस से ही मंडप बना देते थे। तब गली को दोनों छोर से बंद कर देते थे, जिससे यह किसी हॉल जैसी हो जाती थी। वहीं आभूषण बनवाने की जिम्मेदारी नानी ने उठा ली थी, जिसके चलते नाना पर आर्थिक बोझ कम हो गया था।

समय के साथ मैंने महसूस किया है कि ऐसे उत्सव और उनसे जुड़े अनुशासन (कोई इसे अंध श्रद्धा भी कह सकता है, ये उनका निजी चुनाव है) ने सदियों बाद भी पीढ़ियों को कभी निराश नहीं किया है। हर अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने की परंपरा को, मेरी बहन के जन्म के बाद ना सिर्फ सिर्फ मेरी मां ने जारी रखा, बल्कि मेरी पत्नी ने भी परिवार की परंपराओं और घर के बड़े सदस्यों की सलाह पर हमारी बेटी के लिए भी वही प्रथा जारी रखी।

सभी मामलों में खरीदे गए सोने से आभूषण बना लिए और वह बने रहे। लेकिन मेरे नाना, मेरे माता-पिता और खुद मुझ में भी एक बात कॉमन रही कि इन छोटे निवेशों ने हमें आत्मविश्वास दिया। बचत के इस अनुशासन ने अप्रत्यक्ष रूप में हमें यह अहसास कराया कि किसी भी आपात स्थिति में पूरा परिवार इस जमा किए सोने का इस्तेमाल कर सकता है, हालांकि खुशकिस्मती से ऐसी स्थिति कभी नहीं आई।

जो लोग अक्षय तृतीया के इस शुभ अवसर पर बरसों से हर साल सोना खरीदते हैं, उन्होंने अपने निवेश पर 13.8% वार्षिक रिटर्न कमाया है। और जिन लोगों ने साल 2018 से सोना खरीदना शुरू किया, उन्हें भी 20% का सालाना रिटर्न मिला है।

ये मुख्य रूप से हाल के वर्षों में सोने की कीमतों में वृद्धि के कारण हुआ है, खासकर पिछले एक साल में। इस तरह भारतीय त्योहार परंपरा, संस्कृति, आध्यात्मिकता व अनुशासन के धागों से बुनी एक जीवंत गाथा हैं। हमारे त्योहारों की जो सबसे पहली बात मुझे पसंद है, वो है समय प्रबंधन।

त्योहार पंचांग में दिए गए समय पर ही मनाना होते हैं और अपनी सुविधानुसार किसी भी समय पर इन्हें नहीं मना सकते। पंचांग के कई दिनों में उपवास को भी बढ़ावा दिया जाता है, जो कि अप्रत्यक्ष रूप से हमारी पेट की सेहत के लिए भी अच्छा है। इसलिए, ये त्योहार केवल खुशी के अवसर नहीं हैं, बल्कि वित्तीय प्रबंधन जैसे जरूरी मुद्दों पर मूल्यवान सबक भी सिखाते हैं, खासकर उन परिवारों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

हमारे त्योहार कई सीख देते हैं और जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूते हुए व्यक्ति के समग्र विकास में भी योगदान देते हैं। इन त्योहारों से मिली सीखें रचनात्मकता, एकता, कृतज्ञता, पारिवारिक बंधन, उदारता, लचीलापन, अनुशासन आदि को बढ़ावा देती हैं।

तेजी से बदलते इस संसार में ये प्राचीन परंपराएं मानव यात्रा के लिए मूल्यवान मार्गदर्शक का काम करती हैं। ये व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देती है और हमें ज्यादा संतोषजनक जीवन की ओर ले जाती हैं, साथ ही समाज में भी सकारात्मक योगदान देती हैं।

फंडा यह है कि हमारे सभी त्योहारों के पीछे कोई न कोई ठोस आधार हैं, वहीं अक्षय तृतीया का पर्व अनुशासित रूप से निवेश को बढ़ावा देता है, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के बीच।

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