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भूमि पेडनेकर की नई सीरीज ‘दलदल’ एक फरवरी से अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम होने जा रही है। भूमि इस सीरीज में एसीपी रीता फरेरा की भूमिका में नजर आएंगी। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान भूमि ने बताया कि हम बचपन में जिस ट्रॉमा से गुजरे हैं, दलदल वही मानसिक घुटन को दर्शाता है। इसके साथ ही भूमि ने किरदार की तैयारी, अभिनय की चुनौती, पितृसत्ता पर व्यंग्य, ग्लैमर ठुकराकर कंटेंट चुनने के साहस पर बात कीं। पेश है कुछ खास अंश.. सवाल: दलदल नाम बहुत सिम्बॉलिक लगता है। हालांकि आपके शुरुआती करियर से ही आपकी चीजें हमेशा सिम्बॉलिक रहीं हैं, लेकिन ये नाम क्या दर्शाता है? जवाब: मुझे लगता है कि हम सब इंसान के तौर पर अपने बचपन और पास्ट के कई ट्रॉमा से अभी भी जूझ रहे होते हैं, और हमें कई बार पता भी नहीं चलता। बचपन में जो घाव लगे, वो बड़े होकर भी बोझ बनकर साथ चलते रहते हैं। दलदल वैसा ही है। जो क्लॉस्ट्रोफोबिया या घुटन हम बड़े होकर महसूस करते हैं। भले ही परिवार से प्यार मिले, अच्छे दोस्त हों, लेकिन हर किसी की जिंदगी इतनी खूबसूरत नहीं होती। कुछ लोगों का बचपन बहुत कठिन होता है। समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि उन गैप्स को समझें, जिनसे कोई इंसान बड़े होकर गलत फैसले ले लेता है। मेरे लिए दलदल यही दर्शाता है। सवाल: आपकी लाइफ में भी बहुत दर्द रहा है, और उनसे निकलना मुश्किल होता है। जब आप एसीपी रीता फरेरा का किरदार निभा रही थीं, तो वो दर्द चल ही रहा था? जवाब: एक आर्टिस्ट के तौर पर आप अपने पर्सनल एक्सपीरियंस को हमेशा इस्तेमाल करते हैं। वो एक बैंक की तरह होता है, जहां से आप निकालते रहते हैं। इस किरदार के लिए ये जरूरी था। जैसा आपने कहा, बचपन में कई एक्सपीरियंस होते हैं, मेरे साथ भी हुए। स्कूल में हो या एक औरत के तौर पर, आज के जमाने में एक इंडिपेंडेंट औरत को बहुत कुछ फेस करना पड़ता है। कोई टच करता है, कोई गलत नजर से देखता है। अगर आप वर्किंग वुमन हैं, तो हल्की-सी नाइंसाफी हमेशा फील होती है। ये सारे एक्सपीरियंस आप अपने काम में डालते हैं। मैंने ‘दलदल’ में यही किया, लेकिन ये टफ था क्योंकि बार-बार उन ट्रॉमा को दोहराना पड़ता है। सवाल: दलदल में मां बेटी का रिश्ता अहम है, लेकिन रियल लाइफ में आपने पिता के साथ वो दर्द जिया। आपके लिए ये बहुत मुश्किल रहा होगा? जवाब: मेरे पिता के साथ मेरा बहुत खूबसूरत रिश्ता था। उनका जाना मेरे लिए बहुत बड़ा सदमा था। मैं तब बहुत छोटी थी, लेकिन ये एक्सपीरियंस इतना पर्सनल है कि मैं इसे छूती तक नहीं। मैं अपनी फिल्मों में पिता की मेमोरी का शोषण नहीं करना चाहती। कैरेक्टर वर्क के लिए बहुत सी दूसरी चीजें यूज करती हूं, लेकिन इसको नहीं। सवाल: सीरीज में आपकी बॉडी लैंग्वेज कमाल की है। डायलॉग डिलीवरी से लेकर रफ इमोशंस सब निकल रहे हैं। इस किरदार के लिए आपकी तैयारी कैसी रही? जवाब: इसके लिए हमने 3-4 महीने की तैयारी की। पहले डेढ़ महीने सिर्फ किरदार को समझा। मैंने महिला पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की, मेरी मासी हरियाणा पुलिस में हाई लेवल ऑफिसर रहीं हैं। अब रिटायर्ड हैं। मैंने आपराधिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों से बात की। मुझे यह समझना था कि एक औरत इस सिस्टम, राजनीति और दबावों के बीच खुद को कैसे संभालती है। रीता के भीतर बहुत कुछ दबा हुआ है और वही उसे खतरनाक भी बनाता है। सवाल: स्विच ऑन-ऑफ करना और इससे निकलना कितना मुश्किल था? जवाब: बहुत मुश्किल था। एक समय आया जब मैंने फैसला किया कि इससे निकलूंगी नहीं, क्योंकि इसमें घुसना ही उतना ही कठिन था। ये थकान पैदा कर रहा था। मैं एग्जॉस्ट हो गई। रोज किरदार के ट्रॉमा और हैवीनेस में घूम रही थी। सोचा, इससे बाहर न निकलें। फैमिली-दोस्त समझ लेंगे। बेहतर है इसमें जी लूं, डिसकनेक्ट नहीं होना चाहती थी। सवाल: सेट पर सबसे चैलेंजिंग क्या था? कौन सा सीन इतना मुश्किल था? जवाब: एक सीन था शुरुआत में, जहां समारा तिजोरी का किरदार अनीता पहली बार मुझसे मिलने आती है। वहां मुझे पूरी तरह संयमित रहना था। मैं काम कर रही हूं, सवाल पूछ रही हूं। मेरा नेचुरल इंस्टिंक्ट था कि उठूं, थोड़ा ड्रामा करूं, लेकिन नहीं, बस बैठे रहना था। एक कलाकार के तौर पर कुछ करने की चाह होती है, लेकिन यहां कुछ न करना ही अभिनय था। वही सीन मेरे लिए सबसे कठिन और सबसे संतोषजनक रहा। सवाल: वह सीन बहुत अच्छा निकलकर आया भी होगा, जिसमें इग्नोरेंस, अथॉरिटी, जानबूझकर की चीजें सब साफ दिख रही होंगी, क्या कहना चाहेंगी? जवाब: मैं शूटिंग के दौरान बहुत अंडरकॉन्फिडेंट थी। ऐसे पीस करना मुश्किल था जहां डायलॉग कम हों। हमारी प्रैक्टिस ऐसी नहीं रही है।मुझे मोनोलॉग पसंद हैं। जैसे ‘भक्षक’ में 8 मिनट का था, वो ब्यूटीफुल लगता है। लेकिन यहां डायलॉग कम करने को कहा गया तो घबराहट हुई। सोचा, लोग समझ पाएंगे? ये तो न लगे कि कुछ कर ही नहीं रही, बस बैठी हूं। ये मेरे डर थे। अगर आप तक ये पहुंचा तो कॉन्फिडेंस आया। मैं पूरी तरह डायरेक्टर पर पिगीबैक करती हूं। ये उनका मैजिक है कि ये इमोशंस लोगों तक पहुंचे। सवाल: ये अंडरकॉन्फिडेंस और डर जो आप बता रही हैं, जिसका रिजल्ट इतना शानदार है, तो हर एक्टर को ऐसा डर होना चाहिए? पैट्रियार्की और मेल डोमिनेंस वाले कॉम्पिटिशन में आप अपने डिपार्टमेंट के लोगों से कैसे लड़ रही हैं? जवाब: शो मजेदार तरीके से लिखा है। थोड़ा हल्कापन है, जैसे मेरे और कमिश्नर के सीन है। मैंने शो दो बार देखा है। वो सीन बहुत ही सटायर और व्यंग्य से भरे हैं। इंटेंस शो में पैट्रियार्की और पॉलिटिक्स पर इतने लाइट तरीके से स्ट्रॉन्ग कमेंट किया गया है कि वह मेरा फेवरेट पार्ट बन गया है। पुलिस डिपार्टमेंट वाले सीन सबसे अच्छे हैं, और ज्यादातर में मैं नहीं हूं। सवाल: पैट्रियार्की की बात करें तो इंडस्ट्री में भी आपने खुद के दम पर सोलो फिल्में कीं। थैंक यू फॉर कमिंग, भक्षक, अब दलदल। अपने कंधों पर जिम्मेदारी ले रही हो। आपको नहीं लगता कि यहां भी आप उस दलदल से अपने दम पर बाहर निकल रही हो? जवाब: खुद के ट्रॉमा से डील करने का मेरी फिल्में और शोज मेरा जरिया हैं। दम लगा के हईशा, बाला, सोनचिड़िया जैसी फिल्मों से गुजरी हूं। स्कूल में बुलिंग हुई क्योंकि मेरी लुक पॉपुलर लड़कियों जैसी नहीं थी। एडल्टहुड में इन चीजों को एक्सेप्ट करना शुरू किया। सवाल: अंडरकॉन्फिडेंट लड़की परफॉर्मेंस में ट्रांसफॉर्म हो जाती थी। शुरुआती फिल्मों की जर्नी में सबसे खूबसूरत क्या लगता है? जवाब: सच बताऊं तो शुरुआत में मुझमें भरपूर कॉन्फिडेंस था,अब थोड़ा कम हो गया है। तब हिम्मत और साहस था, इसलिए असामान्य भूमिकाएं चुनीं। पिछले साल सोचा कि अपना मूल स्वभाव न खोऊं। फिल्म इंडस्ट्री में बहुत शोर है। अगर खो दिया तो फिल्में नहीं कर पाऊंगी। इसलिए कॉन्फिडेंस बढ़ाया। ‘दम लगा के हईशा’ में भी कॉन्फिडेंट लड़की दिखेगी। स्कूल में बुलिंग होती थी, लेकिन घर पर सपोर्ट मिला, कॉन्फिडेंस कभी नहीं टूटा। स्टेज पर बुलीज को देखती और सोचती थी कि एक दिन दिखा दूंगी। यही वजह है कि अभिनेत्री बनी। सवाल: दर्शकों से दलदल के लिए क्या कहना चाहेंगी? जवाब: यही कहूंगी कि अगर आपको अच्छी कहानियां पसंद हैं, आप सच्चे अभिनय और मेहनत को पहचानते हैं, तो दलदल आपको जरूर पसंद आएगा। इसमें हर विभाग की मेहनत नजर आएगी। यह शो उन दर्शकों के लिए है जो कुछ अर्थपूर्ण देखना चाहते हैं। सवाल: ऐसी हिम्मत कहां से आती है कि ग्लैमरस रोल्स छोड़कर समाज की असल चीजें फिल्मों में लाएं? जवाब: मुझे असल जिंदगी में ग्लैमर बहुत पसंद है। सजना-संवरना, फैशन का मजा लेना पसंद है। लोग पूछते हैं कि इतना फैशन क्यों?” मैं अपने लिए करती हूं, फिल्मों में नहीं लाऊंगी। मेरा दिल हिंदुस्तान की कहानियों में है। जटिल किरदारों में है। अगर किरदार में सच्चाई है तो बाहरी चमक मायने नहीं रखती।
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