कार्ल बेनेडिक्ट फ्रे का कॉलम:  एजीआई हम मनुष्यों का ‘आखिरी आविष्कार’ साबित न​हीं होगी
टिपण्णी

कार्ल बेनेडिक्ट फ्रे का कॉलम: एजीआई हम मनुष्यों का ‘आखिरी आविष्कार’ साबित न​हीं होगी

Spread the love




1960 के दशक में गणितज्ञ आईजे गुड ने एक विचार सामने रखा था, जो तब से सिलिकॉन वैली का सूत्रवाक्य बन गया है। उन्होंने कहा था कि यदि हम एक अल्ट्रा-इंटेलिजेंट मशीन बनाएं, तो वह और भी बेहतर मशीनें डिजाइन कर सकेगी। तब एक ऐसी बुद्धिमत्ता का विस्फोट होगा, जो मनुष्य की बुद्धि-क्षमताओं को बहुत पीछे छोड़ देगा। ऐसे में इस तरह की पहली मशीन मनुष्य का “आखिरी आविष्कार’ साबित होगी। यह भविष्यवाणी- जो कभी साइंस-फिक्शन की बात थी- आज दुनिया की शक्तिशाली संस्थाओं का मकसद बन गई है। लेकिन अगर हम यह मान भी लें कि भविष्य की प्रणालियां आज के मॉडलों से कहीं आगे बढ़ते हुए नए समाधान जनरेट कर सकती हैं, फिर भी “अंतिम-आविष्कार’ वाला सिद्धांत सवालों के दायरे में रहेगा। हमें याद रखना चाहिए कि इनोवेशन किसी आइडिया से लेकर उसके इम्पैक्ट तक बिना किसी रुकावट वाली दौड़ के समान नहीं होता है। इसके बजाय खोज की प्रक्रिया एक शृंखला की तरह है, जिसमें कोई सबसे कमजोर कड़ी भी हो सकती है। ये कमजोर कड़ियां ही मानव-प्रगति का अधिकांश हिस्सा निर्धारित करती हैं। 1986 में, स्पेस शटल चैलेंजर अपने प्रक्षेपण के 73 सेकंड बाद ही धराशायी हो गया था। इसलिए नहीं कि उसके विश्व स्तरीय इंजनों या सॉफ्टवेयर में कोई खराबी आ गई थी, बल्कि इसलिए क्योंकि एक छोटा-सा रबर सील ठंडे वायुमंडलीय तापमान के संपर्क में आने पर फेल हो गया था। उसे ओ-रिंग कहकर पुकारा गया। वह उन महत्वपूर्ण अड़चनों का एक रूपक बन गया है, जो सबसे परिष्कृत प्रणालियों को भी नाकाम बना सकती हैं। कृत्रिम सामान्य बुद्धिमत्ता (एजीआई) भले ही आरंभिक चरणों ​वाली किसी मेडिकल रिसर्च में नाटकीय रूप से तेजी ला सकती हो, लेकिन अगर वह क्लिनिकल ट्रायल्स को आगे नहीं बढ़ा सकती, मैन्युफैक्चर नहीं कर सकती या रेगुलेटरी अनु​मतियां प्राप्त नहीं कर सकती, तो उसका तथाकथित ब्रेक-थ्रू कभी ऐसा आविष्कार नहीं बन पाएगा, जो हमारे जीवन को बेहतर बनाता है। जब खोज के शुरुआती चरण ऑटोमैटेड हो जाते हैं, तब भी मनुष्य की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती; वह बस शेष बाधाओं की ओर स्थानांतरित हो जाती है। और ये वैसी चुनौतियां होती हैं, जिनमें निर्णय, अंतर्निहित ज्ञान और व्यावहारिक कौशल ही सर्वाधिक मायने रखते हैं। एजीआई को न केवल मनुष्यों से बेहतर प्रदर्शन करना होगा; बल्कि उसे एजीआई का उपयोग करके ऐसा करना होगा। अगर “अंतिम-आविष्कार’ वाले सिद्धांत को सच साबित होना है, तो हम मनुष्यों को एआई के साथी या सुपरवाइजर के रूप में भी गैर-जरूरी साबित हो जाना होगा। यह अभी बहुत दूर की कौड़ी है। 2016 में गूगल डीपमाइंड के अल्फागो द्वारा शीर्ष पेशेवर खिलाड़ी ली सेडोल को 4-1 से हराने के बाद उसकी श्रेष्ठता तय हो गई लग रही थी। लेकिन 2023 में शोधकर्ताओं ने दिखाया कि शीर्ष इंजनों को उनके प्रशिक्षण से बाहर असामान्य स्थितियों में ले जाया जाए तो मामूली कंप्यूटिंग कौशल वाला एक मनुष्य भी उन्हें हरा सकता है। मनुष्यों द्वारा दिए जाने वाले इनपुट्स आज भी सबसे ज्यादा वैल्यू-एड करने वाले होते हैं। “अंतिम-आविष्कार’ वाला सिद्धांत यह भी मानता है कि तमाम प्रासंगिक सूचनाओं को कोडिफाई किया जा सकता है, लेकिन ऐसा आमतौर पर नहीं होता। जटिल प्रणालियों को चलाने वाली सूचनाएं अकसर बिखरी हुई, स्थानीय और अनकही होती हैं। नॉलेज कोई पोर्टेबल चीज नहीं है। ऐसे में एजीआई को मनुष्यता का अंतिम आविष्कार करार देना एक अतिरंजित दावा है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *