प्रियदर्शन का कॉलम:  हमारी शिक्षा की व्यवस्था में इतनी ‘परीक्षाएं’ क्यों हैं?
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प्रियदर्शन का कॉलम: हमारी शिक्षा की व्यवस्था में इतनी ‘परीक्षाएं’ क्यों हैं?

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पहले नीट की परीक्षा रद्द हुई, फिर सीबीएसई के नतीजों और पुनर्मूल्यांकन की दिक्कतों ने छात्रों को रुला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नीट के मामले में एनटीए को सख्त फटकार लगाई है। लेकिन हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था में जो बुनियादी खोट है, क्या उसकी ओर किसी का ध्यान है? कम से कम तीन प्रवृत्तियां ऐसी हैं, जो इस शिक्षा-प्रणाली को संकट में डालती हैं। पहली बात तो यह कि हमने परीक्षाओं को ही शिक्षा का पर्याय बना डाला है। शिक्षा बस परीक्षा देने के लिए रह गई है। जबकि शिक्षा के अनेक भ्रष्टाचार परीक्षा से ही शुरू होते हैं- कई विषमताएं भी। अच्छे और खराब स्कूल का फर्क, ट्यूशन, कोचिंग, पेपर लीक, नंबर बढ़वाने की कोशिश- यह सब न हो, अगर इम्तिहान न हों। लेकिन सवाल है, अगर परीक्षा न हो तो शिक्षा के मूल्यांकन का तरीका क्या हो। बच्चे पढ़ें क्यों और शिक्षक पढ़ाएं क्यों? दरअसल इसी सवाल से समझ आता है कि शिक्षा के उद्देश्य को हमने कितना सीमित कर डाला है- वह बस नंबर लाने का जरिया रह गई है। जबकि शिक्षा अपने-आप में एक स्वायत्त चीज होनी चाहिए- उसे बच्चों या छात्रों में सूचना, संवेदना और सरोकार के बीज रोपने चाहिए- इसी से वे ज्ञान और विशेषज्ञता की ओर भी बढ़ सकते हैं। शिक्षक जिम्मेदारी ले सकता है कि वह सुनिश्चित करे बच्चों ने कक्षा की पढ़ाई पूरी कर ली है और वे अगली क्लास की पढ़ाई कर सकते हैं। ऐसे में न कोई फर्स्ट आएगा न फेल होगा। फिलहाल शिक्षक महज एक एजेंट की भूमिका निभाता है, जो पहले से तय एक पाठ्यपुस्तक की जानकारी बच्चों के बीच इस तरह पहुंचा देता है कि वे उन्हें नंबरों में बदल सकें। लेकिन परीक्षा पर हमारी पूरी निर्भरता इतनी ज्यादा है कि हम इस दिशा में सोचने को भी तैयार नहीं हैं। शिक्षा का दूसरा संकट उसके अत्यधिक केंद्रीकरण की कोशिश है। कुछ अरसा पहले तक अलग-अलग राज्यों के बोर्ड ही अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के मुख्य जिम्मेदार होते थे, लेकिन धीरे-धीरे वे लगभग अप्रासंगिक हो चले हैं और बस साधनहीन, हाशिए पर पड़े बच्चों के सरकारी स्कूलों के काम आ रहे हैं। जबकि नीचे से ऊपर तक एक राष्ट्र एक शिक्षा की भ्रामक अवधारणा इस तरह फैली है कि लगता है कि इससे शिक्षा में समानता आएगी। पहले भी बच्चे कॉलेजों में दाखिला लेते थे, लेकिन अब उन्हें सीयूईटी जैसे इम्तिहान से गुजरना है और इसके लिए भी कोचिंग नाम का कारोबार शुरू हो गया है। पहले भी लोग मेडिकल की पढ़ाई करते थे और बिना किसी प्रतियोगिता के बेहतरीन डॉक्टर साबित होते थे, लेकिन अतिशय केंद्रीकरण की कोशिश ने इस पूरे दाखिले की प्रक्रिया को बेहद संदिग्ध बना डाला है। तीसरा संकट शिक्षा और परीक्षा के आधे-अधूरे तकनीकीकरण का है। कोविड के दौर में ही हमने पाया कि ऑनलाइन कक्षाओं में ‘डिजिटल डिवाइड’ ने कितनी बड़ी असमानता पैदा की है। अब सीबीएसई के इम्तिहानों में ओएसएम- यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम का कहर बच्चे झेल रहे हैं। मूल्यांकन की पहले से चली आ रही प्रक्रिया क्या दोषपूर्ण थी? क्या हमारे शिक्षक इस लायक नहीं बचे हैं कि हम उन पर सही मूल्यांकन का भरोसा भी कर सकें? असली बात यही है। शिक्षा की जो सबसे जरूरी कड़ी है, उस शिक्षक को हमने लगभग अदृश्य और बेमानी बना डाला है। गिग वर्करों की तरह शिक्षा मित्रों से काम चलाया जा रहा है। जिस समय भारत में स्कूली व्यवस्था इतनी चाक-चौबस्त नहीं थी, यही शिक्षक या गुरु थे, जिन्होंने कई होनहार पीढ़ियां निकालीं- उनके हाथ से हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक सब निकले। लेकिन अब जब हमने बहुत सारे इंतजाम कर लिए हैं तब शिक्षक को ही किनारे कर दिया है। अगर हम बुनियादी सवालों की ही उपेक्षा करते रहे तो न तो शिक्षा के नाम पर होने वाले घोटाले खत्म होंगे न ही हमारी शिक्षा व्यवस्था बेहतर मनुष्य या पेशेवर गढ़ने का जरिया बन पाएगी। मगर इस दिशा में सोचे कौन?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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