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कुमार रोहित का कॉलम: खाते में पैसा होना ही काफी नहीं, मौके पर उसका मिलना भी जरूरी है

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नौकरी रहते वेतन से घर चलता है, लेकिन नौकरी छूट जाए या सेवानिवृत्ति आ जाए तो गुजारा कैसे होगा? इसी सवाल का जवाब है कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ), जो वेतन के एक हिस्से को बचाकर भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का आधार तैयार करता है। नवंबर में यह संगठन 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ईपीएफओ की शुरुआत 1 नवंबर 1952 को छह उद्योगों में अनिवार्य भविष्य निधि व्यवस्था के साथ हुई थी। सीमेंट, कपड़ा, लोहा-इस्पात जैसे उद्योगों की 50 या अधिक श्रमिकों वाली फैक्ट्रियों से शुरू हुई यह पहल केवल बचत की व्यवस्था नहीं थी। इसका उद्देश्य श्रमिकों को आर्थिक सहारा और सामाजिक सुरक्षा देना था। 15 अगस्त 2025 को लाल किले से घोषित प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना ने ईपीएफओ की भूमिका को और अहम बनाया। 2026 की शुरुआत तक इसके कुल खाते लगभग 34 करोड़ थे, जिनमें 8 करोड़ सक्रिय सदस्य थे। संगठन का कोष 30 लाख करोड़ रु. से अधिक था। यूएएन, ऑटो-ट्रांसफर और केंद्रीकृत पेंशन भुगतान जैसी सुविधाओं ने सेवाएं आसान की हैं। 2024-25 में 6.02 करोड़ दावे निपटे, जबकि 2025-26 में 8.31 करोड़। यानी 2.29 करोड़ अधिक, करीब 38% की बढ़ोतरी। लेकिन कर्मचारी की चिंता तभी दूर होती है, जब संकट में उसे अपना पैसा समय पर मिले। बैंक खाता आज की जरूरतें पूरी करता है, जबकि पीएफ की अनिवार्य बचत बुढ़ापे का सहारा है। जरूरत में राहत मिले, लेकिन भविष्य की सुरक्षा भी बनी रहे। पीएफ निकासी संवेदनशील सवाल है। बीमारी या घर खरीदने जैसी जरूरतों में यह राहत देती है, लेकिन बार-बार निकासी से जमा-पूंजी घटती है। पेंशन के लिए आम तौर पर दस साल की पात्र सेवा जरूरी है। नौकरी छोड़ने पर स्कीम सर्टिफिकेट लेकर सेवा अवधि को पेंशन के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। कर्मचारी को पीएफ, पेंशन और पारिवारिक लाभों की जानकारी रखनी चाहिए। जन्मतिथि, बैंक खाते और नामांकन का विवरण सही होना जरूरी है। नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि जानकारी सही दर्ज करे, अंशदान समय पर जमा करे और गलतियां सुधारे। रिकॉर्ड में गड़बड़ी से भुगतान रुक सकता है। बीमारी, परिवार में मृत्यु या कमाई बंद होने पर ऐसी देरी परेशानी बढ़ा देती है। 1952 के बाद काम की दुनिया बदल गई है। गिग वर्क, ठेके पर काम और दूसरे राज्यों में जाकर रोजी कमाना सामान्य बात है। एक डिलीवरीकर्मी कई प्लेटफॉर्मों पर काम कर सकता है। सामाजिक सुरक्षा को भी इस बदलाव के साथ चलना होगा। यूएएन तभी उपयोगी होगा, जब नौकरी या प्लेटफॉर्म बदलने पर भी अंशदान और सुरक्षा की निरंतरता बनी रहे। टेक्नोलॉजी गलती बता सकती है, लेकिन उसे सुधारने के लिए मानवीय समझ जरूरी है। अपने हक के पैसे की प्रतीक्षा कर रही विधवा को केवल कमी बताने वाला संदेश नहीं, बल्कि उसे दूर करने का रास्ता और जिम्मेदार अधिकारी का मार्गदर्शन भी चाहिए। देरी और परेशानी के समय ही संवेदनशीलता की असली परीक्षा होती है। ईपीएफओ का प्रशिक्षण मॉड्यूल ‘शासन-विधि में करुणा’ इसी जरूरत को पहचानता है। ईपीएफओ के 75वें वर्ष की असली कसौटी उसके कोष का आकार या दावों की संख्या नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर कर्मचारी को उसका हक बिना अनावश्यक देरी मिले, यह होगी। दूसरे राज्य में काम करने वाला निर्माण श्रमिक, सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचा कारखाना कर्मचारी और कई प्लेटफॉर्म पर काम करने वाला डिलीवरीकर्मी- सभी को अपनी जमा-पूंजी और पेंशन पर भरोसा होना चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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