एन. रघुरामन का कॉलम:  ‘सही करने’ से ज्यादा अहम ‘आगे निकलना’ हो जाए तो सामाजिक मूल्य खत्म होते हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘सही करने’ से ज्यादा अहम ‘आगे निकलना’ हो जाए तो सामाजिक मूल्य खत्म होते हैं

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किसी भी समाज की ताकत अकसर उसके संस्थानों की ईमानदारी से मापी जाती है- जैसे स्कूल, जो हमारे युवाओं को गढ़ते हैं या पुलिसकर्मी, जो हमारे मोहल्लों की सुरक्षा करते हैं। लेकिन, इस हफ्ते देश के विभिन्न हिस्सों में हुई तीन घटनाओं ने इस बुनियाद में आती चिंताजनक दरार को दिखाया। जौनपुर और गोवा में पुलिस कॉन्स्टेबल सरेआम चोरी करते हैं और त्रिचि में एक पिता हेडमास्टर से मारपीट कर डालता है। ऐसे में हम सोचने को मजबूर हैं कि कैसे हम इस मुकाम तक पहुंचे, जहां कानून का पालन कराने वाले और भावी पीढ़ी को गढ़ने वाले- दोनों ही चरित्र की बुनियादी परीक्षा में विफल रहे? ये रही उनकी कहानियां। यूपी के जौनपुर में जिन हाथों को अपराधियों को हथकड़ी पहनानी थी, वे 1.6 लाख रुपए के नए आईफोन को पुराने फोन से बदलते हुए सीसीटीवी कैमरे में पकड़े गए। कॉन्स्टेबल मिथिलेश यादव और धनंजय बिंद ने अपनी वर्दी को सम्मान के प्रतीक की तरह नहीं, बल्कि एक तुच्छ-सी चोरी के लिए इस्तेमाल किया। ऐसे ही, गोवा में कॉन्स्टेबल सईश पारसेकर ने कथित तौर पर दुर्घटना के बाद मरते हुए व्यक्ति से 8 लाख रुपए का सोना चुरा लिया। ये सिर्फ मौके का फायदा उठाने वाले अपराध नहीं हैं, बल्कि नैतिकता के गहरे अभाव के संकेत हैं। जब कोई कानून का पालन कराने वाला किसी जानलेवा कार एक्सीडेंट को सेवा के बजाय लूट का मौका समझ ले तो सोशल कॉन्ट्रेक्ट टूट जाता है। ये अधिकारी आधिकारिक रूप से तो थे, लेकिन नैतिक रूप से नदारद। सोचता हूं कि ऐसे लोग पब्लिक सर्विस में क्यों आ जाते हैं? जवाब शायद तमिलनाडु के त्रिचि में हुई घटना में है। वहां के. राजा नाम के एक पिता ने अपने बेटे से ग्रूमिंग कोड का पालन करने के लिए कहने पर ही स्कूल के हेडमास्टर को थप्पड़ जड़ दिया। जब कोई अभिभावक अनुशासन लागू कराने वाले शिक्षक से मारपीट करता है तो वह बच्चे को एक खतरनाक संदेश देता है- नियम कमजोरों के लिए होते हैं और अथॉरिटी को हिंसा से जवाब देना चाहिए। बच्चे के हेयर स्टाइल का यह विवाद असल में बड़ी समस्या का छोटा-सा रूप है। अगर कोई बच्चा यह देखते हुए पला-बढ़ा है कि पैरेंट्स शिक्षकों का अपमान करते हैं और डेकोरम का सम्मान नहीं करते तो जब वह पुलिस या किसी अन्य वर्कफोर्स में जाएगा तो यही समझेगा कि उसकी निजी इच्छा कानून से ऊपर है। जौनपुर और गोवा के कॉन्स्टेबल रातोंरात भ्रष्ट नहीं बने होंगे। ​शायद वे ऐसे माहौल में पले-बढ़े, जहां ‘कठिन और सही रास्तों’ पर ‘मोरल शाॅर्टकट’ को वरीयता दी जाती थी। इससे मुझे महान भौतिक विज्ञानी सर सीवी रमण की कहानी याद आती है, जिन्होंने स्किल के बजाय ईमानदारी को चुना। ये कहानी यह समझने में मदद करती है कि हमारी आधुनिक व्यवस्था में क्या मिसिंग है। एक बार लैब असिस्टेंट की भर्ती के दौरान रमन ने एक उम्मीदवार को तकनीकी आधार पर रिजेक्ट कर दिया। कुछ घंटों बाद वह युवक सात रुपए लौटाने वापस दफ्तर आया। उसने बताया कि विभाग ने उसे यात्रा भत्ते देने में गलती कर दी और वह ये अतिरिक्त पैसा नहीं रख सकता। यह देखकर रमन ने तुरंत उसे नौकरी दे दी और कहा ​कि ‘मैं तुम्हें फिजिक्स सिखा सकता हूं, लेकिन ईमानदारी नहीं।’ रमन एक बुनियादी सच जानते थे, जिसे भर्ती और पैरेंटिंग की हमारी आधुनिक व्यवस्था भूल चुकी है- दक्षता एक कौशल है, लेकिन ईमानदारी मूल गुण है। आप किसी को बंदूक चलाना या समीकरण हल करना सिखा सकते हैं, लेकिन एक बार बुनियाद ही दरक चुकी हो तो किसी को चरित्रवान बनना नहीं सिखा सकते। निलंबित कॉन्स्टेबल और आक्रामक पिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि पैरेंट्स शिक्षकों की अथॉरिटी कम करते रहेंगे तो हम पुलिस अधिकारियों समेत ऐसे पेशेवरों की पीढ़ी पैदा करते रहेंगे, जो अपने पद को सार्वजनिक सेवा के बजाय निजी लाभ का साधन समझेंगे। फंडा यह है कि अगर एक समाज के तौर पर हमने ऐसी संस्कृति बना दी, जहां ‘सही करने’ से ज्यादा महत्व ‘आगे निकलने’ का हो गया, तो आप जानते हैं कि हमारे बच्चों का भविष्य कैसा होगा।



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