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हाल ही पुणे यात्रा के दौरान मैंने खुद को ऐसे शहर में पाया, जिसकी शहरी संरचना बिल्कुल बदल चुकी थी। मैं कई किलोमीटर फैल चुके विशाल मेट्रो पिलर्स के नीचे से गुजरा तो उनकी परछाइयां नीचे रेंग रही कारों पर पड़ रही थीं। दमघोंटू ट्रैफिक के बीच मैंने अपने दोस्त से पूछा, ‘यहां पहले जो लोग हुआ करते थे, उनका क्या हुआ? कोल्ड ड्रिंक वाले, नारियल पानी विक्रेता और फ्रूट स्टॉल्स वाले– जो इन खंभों से पहले यहां खड़े रहते थे?’ दोस्त ने कहा कि ‘किसी शहर के विकास के लिए पुरानी चीजों को हटना ही पड़ता है।’ पूरी तरह आर्थिक नजरिए से देखें तो वह सही थे। पुणे नगर निगम ने कमाई का एक फायदेमंद और नया जरिया ढूंढ लिया है। इन पिलर्स पर लगे विज्ञापनों से उसने दो साल में 3.4 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाए हैं। अक्टूबर 2024 से मार्च 2026 के बीच यह कमाई लगातार बढ़ी। जैसे-जैसे मेट्रो फैलेगी, इसके और बढ़ने की उम्मीद है। फिर भी, जब नगर निगम साल दर साल फीस बढ़ा रहा है तो कोई यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि इस ‘प्रगति’ की असली कीमत क्या है। यह बदलाव मुझे नागपुर की याद दिलाता है। 50 साल पहले पुणे और नागपुर को साइकिलों के लिए जाना जाता था। आज साइकिलें बहुत कम दिखती हैं। कई साल बाद जब मैं नागपुर के सीताबरडी लौटा तो तत्काल ही मैंने उस पंचर वाले को ढूंढा, जो कभी एक कोने में बैठा करता था। मेरे साथ वाले को पता नहीं था कि वह कहां गया। उन्होंने कहा कि अब यह कारोबार चलाने के लिए साइकिलें ही बहुत कम बची हैं। मैंने पुरानी आटा चक्कियों और उन टिन कारीगरों के बारे में पूछा, जो तेल के डिब्बों को किचन स्टोरेज में बदल देते थे। लेकिन जवाब वही था कि ‘अब कौन खुद अनाज पीसता है’ या ‘स्टोरेज के तरीके तो बहुत पहले बदल चुके।’ मन में ठान कर मैंने दो दिन खोज की और अंतत: उस पुराने पंचर वाले को ढूंढ निकाला। वह परिवार के साथ छोटी–सी झोपड़ी में रह रहा था। स्कूली दिनों में मेरी साइकिल को बेदह कम खर्च में दुरुस्त रखने के लिए मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। उन बहुत-सी मुफ्त मरम्मतों के बदले जब मैंने कुछ पैसे उनकी जेब में रखे तो वो रो पड़े। गली में लौटते वक्त मुझे एहसास हुआ कि कभी जो रौनक वहां हुआ करती थी, अब गायब हो चुकी। अगर आप अपने स्कूल के बाहर ‘बेर’ बेचने वाली उन बुजुर्ग महिला से नहीं मिले हैं, जो चंद सिक्कों में नमक लगे उबले ‘बेर’ देती थीं, तो एक बार उन्हें ढूंढिए। उनसे मिलिए। वो नहीं, बल्कि आप अच्छा महसूस करेंगे। यही कमी मुझे इस वीकेंड मुंबई में महसूस हुई। मेरी गली के आखिर में स्नैक्स और फूल बेचने वाली ‘गजरा वाली’ महिला गायब थीं। मुझे बताया गया कि रसोई गैस के बढ़ते दामों के कारण उन्हें काम बंद करना पड़ा। इसी सड़क पर हर सुबह एक दूधवाला बीते पच्चीस साल से बैठता है। हड़ताल, बाढ़ या तूफान में भी वह कभी वहां से एक इंच भी नहीं हटा। कभी–कभार जब वो नहीं आता था तो उसके ग्राहक ही नहीं, बल्कि वहां से गुजरता हर राहगीर भी पूछता कि ‘आज दूधवाले को क्या हुआ?’ जो चीजें हमारा ध्यान खींचती हैं, वो कभी अस्थायी विज्ञापन या नया इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होता। यह उन छोटे कारोबारों की गैर–मौजूदगी होती है, जिन्होंने हमें बड़े होते देखा। ये लोग महज दुकानदार नहीं हैं, बल्कि वो जाने–पहचाने चेहरे हैं, जो शहर की आर्थिक–सामाजिक रफ्तार बनाए रखते हैं। आधुनिक कमाई के तरीके निर्माण कार्यों का पैसा दे सकते हैं, लेकिन यदि ये छोटे कारोबार बंद हो जाएं तो वे कभी उस समुदाय में फिर से जान नहीं फूंक सकते। फंडा यह है कि सच्ची प्रगति महज इंफ्रास्ट्रक्चर और विज्ञापन की कमाई से नहीं मापी जाती। हमें सुनिश्चित करना होगा कि आधुनिक विकास उन छोटे और साधारण व्यवसायों को खत्म न कर दे, जो किसी शहर की धड़कन होते हैं।
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