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हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद करके ईरान ने ट्रम्प प्रशासन को एक तरह की अभ्यास परीक्षा दे दी है। इसे उत्तीर्ण करने, या दूसरे शब्दों में कहें कि ताइवान पर चीन के संभावित हमले या नाकेबंदी के खिलाफ प्रतिरोध की क्षमता बरकरार रखने के लिए अमेरिका को निर्णायक तरीके से इस स्ट्रेट को फिर से खुलवाना ही होगा। हॉर्मुज स्ट्रेट और ताइवान स्ट्रेट, इन दोनों संकरे समुद्री मार्गों को बंद करने से अर्थव्यवस्था 20वीं सदी के मध्य की स्थिति तक पिछड़ सकती है। पिछले डेढ़ महीने में ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को एक तैरती शूटिंग गैलरी में बदल दिया है। जहाजों की आवाजाही घट गई है, टैंकर डर–डर के चल रहे हैं और ईरानी स्पीडबोट और ड्रोन समुद्री लुटेरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। इस ठहराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जकड़ लिया है, क्योंकि दुनिया के तेल और एलपीजी का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यह सिर्फ मध्य-पूर्व का संकट ही नहीं, बल्कि एशिया में संघर्ष की रिहर्सल है। इससे चीन को ताइवान के खिलाफ रणनीति की योजना मिल रही है। ताइवान स्ट्रेट भी हॉर्मुज जैसा ही है, लेकिन सेमीकंडक्टर के लिए। दुनिया की सबसे एडवांस चिप्स का 90% से अधिक हिस्सा ताइवान की कंपनी टीएसएमसी बनाती है। यही चिप्स एआई डेटा सेंटर्स, लड़ाकू विमानों और स्मार्टफोन का ‘ब्रेन’ कहलाती हैं। विदेशी चिप्स पर निर्भरता के राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए अमेरिका ने 2022 का ‘चिप्स एंड साइंस एक्ट’ पारित किया था, ताकि निर्माताओं को देश में ही फैक्ट्री लगाने के लिए आकर्षित किया जा सके। लेकिन टेक्सास, ओहायो और न्यूयॉर्क समेत कई जगहों पर नई फैब्रिकेशन इकाइयों की योजना के बावजूद अमेरिका आज भी बहुत हद तक चिप्स के आयात पर ही निर्भर है। ऐसे में, यदि चीन ताइवान पर हमला या नाकेबंदी करता है तो 21वीं सदी का तकनीकी ‘नर्वस सिस्टम’ ही ठप हो सकता है। वैश्विक नुकसान 10 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह महज मंदी नहीं, बल्कि सप्लाई चेन का ‘कार्डियक अरेस्ट’ जैसा होगा। शी जिनपिंग नहीं चाहते कि उन्हें चीन के इतिहास में महज ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाना जाए, जिसने इलॉन मस्क से बेहतर कार बैटरियां बनाईं। शी तो वह हासिल करना चाहते हैं, जिसका वादा माओत्से तुंग ने किया था– एक चीन, बिना किसी शर्त और बिना किसी ऐसे बागी द्वीप के, जो कम्युनिस्ट नेतृत्व को चुनौती दे। अगर शी को यह लगता है कि ताइवान पर हमले के बाद अमेरिका कार्रवाई में हिचकिचाएगा या समझौता करेगा तो उसकी प्रतिरोध की ताकत जाती रहेगी। यदि दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना भी एक कमजोर क्षेत्रीय ताकत के सामने टैंकरों को सुरक्षित नहीं निकाल सकती, तो शी क्यों यह मानेंगे कि ताइवान पर चीनी नाकेबंदी तोड़ने के लिए अमेरिका अपने विमानवाहक पोत, पनडुब्बियां और हजारों सैनिकों की जान जोखिम में डालेगा? गेम थ्योरिस्ट इसे ‘क्रेडिबल कमिटमेंट’ कहते हैं। यानी, आपके विरोधी को यह भरोसा होना चाहिए कि आप अपनी कथनी के अनुसार काम करोगे। ऐसा नहीं होता तो पूरा खेल ही बिगड़ जाता है। यह सच है कि विश्वसनीयता एक बार खो जाए तो उसे वापस पाना आसान नहीं होता। अब इस समस्या का समाधान पीड़ादायक, लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका को हॉर्मुज स्ट्रेट को निर्णायक तरीके से वापस खुलवाना होगा। इस कार्रवाई में स्ट्रेट में एस्कॉर्ट, माइन–स्वीपर्स लगाना, लॉन्च साइट्स पर हमले और ईरानी टोलबूथ द्वीपों पर कब्जा करना शामिल है। एक बार रास्ता सुरक्षित हो जाए तो अमेरिका को वहां अपने बड़े जहाज भेजने चाहिए, जिससे दुनिया यह देख ले कि रास्ता व्यापार के लिए खुला है। दीर्घकालीन नजरिए से अमेरिका को जहाज निर्माण तेज करना होगा, हथियार जमा करने होंगे और सऊदी अरब, यूएई में पाइपलाइनों का विस्तार करना होगा। 2020 में ग्रीस, मिस्र, फिलिस्तीनी नेशनल अथॉरिटी और इजरायल ने अन्य देशों के साथ ईस्ट मेडिटेरेनियन गैस फोरम की स्थापना की, ताकि नए गैस भंडारों का उपयोग हो सके। दुर्भाग्य से, बाइडेन प्रशासन ने इजरायल से यूरोप तक प्रस्तावित पाइपलाइन के लिए अमेरिकी समर्थन वापस ले लिया। जबकि, यह वैसा ही प्रोजेक्ट है, जो हॉर्मुज पर निर्भरता को घटा सकता है। अमेरिका के सामने चुनाव स्पष्ट है: या तो अपनी ताकत से हॉर्मुज खुलवाए, या फिर शी को ताइवान पर हमले की तैयारी करते हुए देखे। अच्छी बात यह है कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे घातक नौसेना और ऐसी आर्थिक ताकत है, जो किसी भी विरोधी को मात दे सकती है। चीन ताइवान पर हमला या नाकेबंदी करता है तो 21वीं सदी का तकनीकी ‘नर्वस सिस्टम’ ही ठप हो सकता है। वैश्विक नुकसान 10 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। यह मंदी नहीं, सप्लाई चेन का ‘कार्डियक अरेस्ट’ होगा। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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