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नई दिल्ली1 घंटे पहले
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मामला चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून से जुड़ा हुआ है।
कांग्रेस नेता जया ठाकुर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका पर दिया गया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से आजीवन छूट देने वाले कानून को चुनौती दी गई है। याचिका पर CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि वह इस कानून की जांच करना चाहती है।
कांग्रेस नेता जया ठाकुर की याचिका में कहा गया कि…
- यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके कामकाज से जुड़े मामलों में पूरी जिंदगी के लिए नागरिक और आपराधिक कार्रवाई से बचाव देता है।
- ऐसी सुरक्षा संविधान बनाने वालों ने न्यायाधीशों को भी नहीं दी थी। इसलिए संसद ऐसा संरक्षण नहीं दे सकती, जो संविधान में दूसरे बड़े पदों पर बैठे लोगों को नहीं मिला।
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर विपक्ष का विरोध है। इनमें एक प्रावधान जोड़ा गया था, जिसके तहत…
‘अगर चुनाव कराते समय या उससे जुड़े किसी फैसले में कोई गलती या विवाद होता है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों पर निजी तौर पर केस नहीं किया जा सकेगा। यह सुरक्षा उनके पूरे जीवन तक लागू रहेगी, भले ही वे पद पर न हों।’
अब तारीखों में पूरा मामला समझिए

15 मार्च 2024 को ज्ञानेश कुमार और डॉ. सुखबीर सिंह संधू ने चुनाव आयुक्त का पद संभाला था। इसके बाद 19 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए।
2 मार्च 2023: SC का फैसला- सिलेक्शन पैनल में CJI को शामिल करना जरूरी
CEC और EC की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक पैनल करेगा। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और CJI भी शामिल होंगे। इससे पहले सिर्फ केंद्र सरकार इनका चयन करती थी।
यह पैनल CEC और EC के नामों की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगा। इसके बाद राष्ट्रपति मुहर लगाएंगे। तब जाकर उनकी नियुक्ति हो पाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह प्रोसेस तब तक लागू रहेगा, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बना लेती।
21 दिसंबर 2023: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा नया बिल संसद में पास
केंद्र सरकार CEC और EC की नियुक्ति, सेवा, शर्तें और अवधि से जुड़ा नया बिल लेकर आई। इसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों का पैनल करेगा।
इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। पैनल से CJI को बाहर रखा गया। 21 दिसंबर 2023 को शीतकालीन सत्र के दौरान यह बिल संसद के दोनों सदनों में पास हो गया।
4 दिसंबर 2025: विपक्षी दलों का कहना था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश के खिलाफ बिल लाकर उसे कमजोर कर रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया।

नया कानून सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन
कांग्रेस कार्यकर्ता जया ठाकुर ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि धारा 7 और 8 स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन है क्योंकि यह चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र तंत्र (independent mechanism) प्रदान नहीं करता है।
याचिका में यह कहा भी गया है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के फैसले को पलटने के लिए बनाया गया, जिसने CEC और EC को एकतरफा नियुक्त करने की केंद्र सरकार की शक्तियां छीन ली थीं। यह वो प्रथा है जो देश की आजादी के बाद से चली आ रही है।

चुनाव आयोग में कितने आयुक्त हो सकते हैं?
चुनाव आयुक्त कितने हो सकते हैं, इसे लेकर संविधान में कोई संख्या तय नहीं की गई है। संविधान का अनुच्छेद 324 (2) कहता है कि चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। यह राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि इनकी संख्या कितनी होगी। आजादी के बाद देश में चुनाव आयोग में सिर्फ एक चुनाव आयुक्त होता था।
16 अक्टूबर 1989 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की। इससे चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय बन गया। ये नियुक्तियां 9वें आम चुनाव से पहली की गई थीं। उस वक्त कहा गया कि यह फैसला मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री के पर कतरने के लिए लिया गया था।
2 जनवरी 1990 को वीपी सिंह सरकार ने नियमों में संशोधन किया और चुनाव आयोग को फिर से एक सदस्यीय निकाय बना दिया। एक अक्टूबर 1993 को पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने फिर अध्यादेश के जरिए दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को मंजूरी दी। तब से चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त होते हैं।








