केदारनाथ आपदा के 13 साल, 700 करोड़ से संवरा धाम:  आज के दिन तीसरे चरण में पहुंचा था ऑपरेशन सूर्य होप, ऐसे बदली तस्वीर – Uttarakhand News
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केदारनाथ आपदा के 13 साल, 700 करोड़ से संवरा धाम: आज के दिन तीसरे चरण में पहुंचा था ऑपरेशन सूर्य होप, ऐसे बदली तस्वीर – Uttarakhand News

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आपदा के बाद पुनर्निर्माण, नई सुविधाओं और बेहतर प्रबंधन ने केदारनाथ धाम को नया स्वरूप दिया।

जून 2013 की केदारनाथ आपदा को 13 साल पूरे हो गए हैं। 16 और 17 जून को हुई भीषण बारिश, चौराबाड़ी ताल के टूटने और बाढ़ ने ऐसी तबाही मचाई कि हजारों लोग फंस गए और पूरी केदारघाटी मलबे में तब्दील हो गई।

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राहत और बचाव के लिए ऑपरेशन सूर्य होप चलाया गया। इसका तीसरा चरण आज ही के दिन, 23 जून 2013 को शुरू हुआ। 14 दिन तक चले इस महाअभियान में सेना, वायुसेना, आईटीबीपी एवं अन्य एजेंसियों ने श्रद्धालुओं की खोज, राहत और बचाव कार्य किए और यह देश के सबसे बड़े रेस्क्यू अभियानों में शामिल हो गया।

इस आपदा के बाद केदारनाथ यात्रा के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए थे, लेकिन 13 साल बाद केदारनाथ की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। करीब 700 करोड़ रुपए की लागत से केदारपुरी का पुनर्निर्माण किया गया है। नए पैदल मार्ग, सुरक्षा दीवारें, घाट, हेलीपैड, आवासीय सुविधाएं और आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित किया गया है। हर साल श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच रही है।

पहले आपदा से जुड़ी PHOTOS देखिए…

केदारनाथ आपदा के बाद मलबे में तब्दील केदारघाटी।

केदारनाथ आपदा के बाद मलबे में तब्दील केदारघाटी।

केदारनाथ मंदिर परिसर भी मलबे की चपेट में आया था।

केदारनाथ मंदिर परिसर भी मलबे की चपेट में आया था।

राहत और बचाव कार्यों के लिए ऑपरेशन सूर्य होप चला।

राहत और बचाव कार्यों के लिए ऑपरेशन सूर्य होप चला।

सेना के जवानों ने हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला।

सेना के जवानों ने हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला।

जान जोखिम में डालकर दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को बचाया।

जान जोखिम में डालकर दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को बचाया।

5 प्वाइंट में जानिए ऐसे बदला धाम…

1. तबाही के बाद लौटी आस्था

16 और 17 जून 2013 को हुई भीषण बारिश, चौराबाड़ी ताल के टूटने और आई बाढ़ ने केदारपुरी को पूरी तरह तबाह कर दिया था। मंदाकिनी घाटी में मलबा, बोल्डर और पानी का तेज बहाव अपने साथ हजारों लोगों को बहा ले गया था। उस समय यह आशंका जताई जा रही थी कि केदारनाथ यात्रा को दोबारा पटरी पर लौटने में कई दशक लग सकते हैं।

हालांकि, समय के साथ हालात बदले। पुनर्निर्माण, बेहतर प्रबंधन और श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास ने केदारनाथ यात्रा को नई पहचान दी।

पुनर्निर्माण, बेहतर प्रबंधन से हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे।

पुनर्निर्माण, बेहतर प्रबंधन से हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे।

2. मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट से बदली केदारपुरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत केदारपुरी के पुनर्निर्माण कार्यों को नई गति मिली। मंदिर परिसर का विस्तार किया गया और आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनर्निर्माण कराया गया। तीर्थपुरोहितों के लिए 400 से अधिक भवन बनाए गए, जबकि श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक कॉटेज, आवासीय सुविधाएं और सार्वजनिक ढांचा विकसित किया गया।

घाट, चबूतरे और नए पैदल मार्गों के निर्माण ने केदारपुरी को नया स्वरूप दिया।

चार साल पहले केदारनाथ दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पहले नंदी के दर्शन किए, फिर गर्भगृह में पूजा-अर्चना कर पुनर्निर्माण कार्यों का जायजा लिया।

चार साल पहले केदारनाथ दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पहले नंदी के दर्शन किए, फिर गर्भगृह में पूजा-अर्चना कर पुनर्निर्माण कार्यों का जायजा लिया।

3. नया पैदल मार्ग और बेहतर सड़कें बनीं

आपदा में रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे कई स्थानों पर बह गया था। बाद में इसे ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत मजबूत किया गया। भीमबली से केदारनाथ तक करीब 10 किलोमीटर लंबा नया पैदल मार्ग तैयार किया गया, जहां छोटी लिनचोली, लिनचोली और रुद्रा प्वाइंट जैसे नए पड़ाव विकसित किए गए।

पूरे ट्रैक को तीन से चार मीटर तक चौड़ा किया गया और सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई गई। इससे यात्रा पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो गई है।

मंदाकिनी-सरस्वती नदियों के किनारे 18 फीट ऊंची और 2 फीट चौड़ी 3 लेयर सेफ्टी वॉल बनाई गई, इससे बाढ़ के हालात में मंदिर सेफ रहेगा।

मंदाकिनी-सरस्वती नदियों के किनारे 18 फीट ऊंची और 2 फीट चौड़ी 3 लेयर सेफ्टी वॉल बनाई गई, इससे बाढ़ के हालात में मंदिर सेफ रहेगा।

4. स्वास्थ्य, सुरक्षा और आपात सुविधाएं बढ़ीं

आपदा से पहले धाम में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन अब यात्रा मार्ग और केदारनाथ में स्वास्थ्य केंद्र, आपात चिकित्सा सेवाएं और राहत व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। विभिन्न पड़ावों पर भोजन, प्राथमिक उपचार और विश्राम की सुविधाएं विकसित की गई हैं। वर्तमान में धाम में 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है।

इसके साथ ही मौसम अलर्ट, ऑनलाइन पंजीकरण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा तंत्र को भी पहले के मुकाबले काफी मजबूत किया गया है।

ये तस्वीर 17 जून 2013 की थी। इसे नासा ने जारी किया था। इसमें बताया था कि उत्तराखंड समेत पूरे उत्तर भारत में कैसे बादलों का घेरा बना हुआ था।

ये तस्वीर 17 जून 2013 की थी। इसे नासा ने जारी किया था। इसमें बताया था कि उत्तराखंड समेत पूरे उत्तर भारत में कैसे बादलों का घेरा बना हुआ था।

5. तीन चरणों में पुनर्निर्माण कार्य किए जा रहे

केदारपुरी में करीब 700 करोड़ रुपए की लागत से तीन चरणों में पुनर्निर्माण कार्य किए जा रहे हैं। मंदिर के पीछे 390 मीटर लंबी त्रिस्तरीय सुरक्षा दीवार बनाई गई है। मंदाकिनी और सरस्वती नदी के किनारे तटबंध, घाट और चबूतरे विकसित किए गए हैं।

वीआईपी और मुख्य हेलीपैड, ध्यान गुफाएं, ईशानेश्वर मंदिर, हाट बाजार, सीवर लाइन और अन्य आधारभूत सुविधाओं का भी विस्तार किया गया है।

इस साल भी बन सकता है नया रिकॉर्ड

आपदा से पहले प्रतिवर्ष 3 से 4 लाख श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचते थे, जबकि अब यह संख्या 15 से 20 लाख के बीच पहुंच रही है। इस वर्ष यात्रा शुरू होने के करीब डेढ़ महीने में ही 13.04 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन कर चुके हैं।

यात्रा कंट्रोल रूम रुद्रप्रयाग के अनुसार 22 जून की शाम 5 बजे तक 13,04,095 श्रद्धालु धाम पहुंच चुके हैं। पिछले आंकड़े भी यात्रा के प्रति बढ़ते विश्वास को दिखाते हैं।

अब पढ़िए केदारनाथ आपदा की कहानी…

कैसे चौराबाड़ी झील का पानी बना तबाही की वजह

17 जून 2013, दिन सोमवार था और जगह थी केदारनाथ धाम। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ हिमालय की गढ़वाल पर्वतमाला में बसा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊंचाई पर स्थित धाम है।

करीब 3562 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हजारों वर्ष पुराने केदारनाथ मंदिर के पीछे विशाल हिमालयी पर्वत श्रृंखलाएं हैं। इस ऊंचाई पर पेड़-पौधे बहुत कम मिलते हैं और अधिकांश क्षेत्र बर्फ, ग्लेशियरों, नदियों और झीलों से घिरा हुआ है। पूरे इलाके का एक बड़ा हिस्सा ग्लेशियरों से आच्छादित है।

अगर कोई श्रद्धालु मंदिर के सामने खड़ा हो, तो उसके बाईं ओर मंदाकिनी नदी बहती दिखाई देती है। यह नदी मंदिर के पीछे स्थित चौराबाड़ी ग्लेशियर से निकलती है। इसी ग्लेशियर के पास एक झील भी स्थित है, जिसे चौराबाड़ी झील या गांधी सरोवर कहा जाता है।

साल 2013 में लगातार हो रही बारिश के कारण इस झील में पानी का दबाव तेजी से बढ़ा। 16 और 17 जून की रात चौराबाड़ी झील का किनारा टूट गया और भारी मात्रा में पानी, मलबा और बोल्डर मंदाकिनी घाटी की ओर बह निकले। यही सैलाब कुछ ही मिनटों में केदारपुरी तक पहुंचा और इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में से एक बन गया।

केदारनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर मधुगंगा और दूधगंगा नाम की नदियां मंदाकिनी में मिल जाती हैं। मंदिर के दाईं ओर पहाड़ों से एक और नदी निकलती है। इसका नाम है सरस्वती। केदारनाथ पहुंचकर सरस्वती नदी का संगम भी मंदाकिनी में हो जाता है।

तीन दिन से भीग रहा था पूरा उत्तराखंड

इस हादसे से पहले पूरे उत्तराखंड में तीन दिन से बारिश हो रही थी। केदारनाथ, जिस रुद्रप्रयाग जिले में आता है, वहां भी बारिश हो रही थी पर उतनी तेज नहीं। रुद्रप्रयाग में 14-15 जून को सिर्फ 15 मिमी बारिश हुई थी, लेकिन 16 जून को एक ही दिन में यहां 89 मिमी बारिश हो गई थी।

16 जून को केदारनाथ में जब शाम की आरती की तैयारियां चल रही थीं, तभी अचानक यहां तेज बारिश शुरू हो गई। कुछ ही मिनटों में केदारनाथ मंदिर का परिसर पानी से लबालब भर गया। ऐसा कहते हैं कि कुछ लोग तो उसी समय डूब भी गए थे।

थोड़ी ही देर में अंधेरा छा गया। बत्ती गुल हो गई। बिजली के लिए जो पावर हाउस था, वो भी फेल हो गया। कुछ ही घंटों में वहां का मंजर पूरा बदल गया। चारों तरफ पानी ही पानी। जबरदस्त कीचड़। रोते-बिलखते-घबराते लोग। 16 की शाम को तेज बारिश जैसे ही शुरू हुई, जगह-जगह लैंडस्लाइड होने लगे। पुल टूट गए। रास्ते बंद हो गए।

भगवान शिव की ये मूर्ति ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन गंगा घाट पर है। 2013 में जब यहां बाढ़ आई, तो करीब 15 फीट ऊंची ये मूर्ति भी गले तक डूब गई थी।

भगवान शिव की ये मूर्ति ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन गंगा घाट पर है। 2013 में जब यहां बाढ़ आई, तो करीब 15 फीट ऊंची ये मूर्ति भी गले तक डूब गई थी।

दूधगंगा नदी से मलबा बहकर मंदाकिनी में आ गया

दूधगंगा नदी से मलबा बहता हुआ मंदाकिनी नदी में आ गया। इसने मंदाकिनी नदी का रास्ता रोक दिया। कुछ ही देर में मंदाकिनी नदी के बाईं ओर से सरस्वती नदी को निकलने का रास्ता मिल गया। सरस्वती नदी केदारनाथ मंदिर के पूरब में बहने लगी। नतीजा ये हुआ कि मंदिर में ठहरे लोग पानी में डूब गए। बह गए।

रातभर लगातार बारिश से चौराबाड़ी झील का स्तर भी बढ़ गया। लेकिन, ग्लेशियर की वजह से पानी निकल भी नहीं पा रहा था। अगले दिन 17 जून की सुबह 7 बजे पानी निकला। इस पानी के साथ ग्लेशियर के टुकड़े और मलबा भी था। इसने मंदाकिनी नदी को मंदिर के रास्ते पर मोड़ दिया। इससे मंदिर में ही पानी, कीचड़, मलबा चला गया और तबाही मच गई।

बाढ़ के अगले दिन केदारनाथ धाम के चारों ओर सिर्फ मलबा ही मलबा पड़ा हुआ था। हर तरफ कीचड़ जम गया था।

बाढ़ के अगले दिन केदारनाथ धाम के चारों ओर सिर्फ मलबा ही मलबा पड़ा हुआ था। हर तरफ कीचड़ जम गया था।

सिर्फ 5 दिन में बरसा था साढ़े 3 हजार मिमी पानी

उत्तराखंड और केदारनाथ में आई इस त्रासदी के 4 साल बाद उत्तराखंड सरकार ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 14 जून से 18 जून के बीच 5 दिन में साढ़े 3 हजार मिमी से ज्यादा बारिश हुई थी। इतनी बारिश तो पूरे मॉनसून पीरियड (जून से सितंबर) में होने वाली बारिश से भी ज्यादा थी।

जिस रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ है। वहां इन 5 दिनों में 256.6 मिमी बारिश हुई थी। इसमें से 240.8 मिमी बारिश तो अकेले 16, 17 और 18 जून को ही हुई थी। ज्यादा बारिश की वजह से यहां की बर्फ भी पिघलने लगी थी। इससे यहां की सभी प्रमुख नदियों का जलस्तर बढ़ गया। 18 जून को मंदाकिनी नदी खतरे के निशान से 7.5 मीटर ऊपर बह रही थी।

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