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- Kaushik Basu’s Column India’s Role Is Important In This Difficult Time
7 घंटे पहले
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कौशिक बसु विश्व बैंक के पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट
आज दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अब तक के अपने सबसे कठिन दौर से में से एक से गुजर रही है। राजनीति का ध्रुवीकरण हो रहा है। अर्थहीन टैरिफ वॉर शुरू हो गए हैं। राजनीतिक विवादों के चलते सभी के सिर पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, फिर आप चाहे जिस देश में रहते हों। ऐसे में भारत के पास एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
ऐतिहासिक तौर पर गरीब देश होने के बावजूद संघर्षों के समय दुनिया में भारत का विशेष स्थान रहा है। वह तुलनात्मक रूप से तटस्थ देश था। मजबूत उच्च शिक्षा प्रणाली ने उसे दुनिया में प्रबुद्ध देश का दर्जा दिलाया। गुटनिरपेक्ष देशों के अगुवाओं में से एक, और लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवाज होने के नाते भारत दुनिया में अलग खड़ा हुआ था।
नेहरू की मृत्यु के बाद आई श्रद्धांजलियों में भी भारत की इस वैश्विक भूमिका पर जोर दिया गया। उस वक्त भारत में अमेरिकी राजदूत चेस्टर बॉउल्स ने कहा था- मानवता के जंगल का विशाल वृक्ष ढह गया है। भारत ने अपना महानतम नेता, और विश्व ने सभी के लिए शांति, न्याय और गरिमा का प्रभावी स्वर खो दिया।
यहां यह याद रखने योग्य है कि मौजूदा हालात के उलट उन दिनों भारत नैतिक आधार पर अमेरिका की विदेश नीति का सार्वजनिक विरोध करता था। हालांकि इसके बावजूद- या कहें संभवत: इसी के कारण- अमेरिकी भारत का बहुत सम्मान करते थे!
हाल के वर्षों में भारत की वैश्विक आवाज अपेक्षाकृत तौर पर कमजोर हुई है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के भले के लिए अपने उस दर्जे को वापस प्राप्त करे। हालांकि उसे पाने के लिए जरूरी है कि हम में अपनी विफलताओं को स्वीकारने का साहस हो और हम सुधार के कदम उठाएं।
हमें अपने बुनियादी मूल्यों के लिए उठ खड़ा होने का साहस जुटाने की जरूरत है। यह सच है कि आज कई देशों ने कट्टरतावाद को अपना लिया है। अफगानिस्तान में तो यह सीधे तौर पर हुआ है और पाकिस्तान में भी हुआ है, जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की अवमानना की जा रही है।
यह पूरी विचारशील मानव जाति के लिए परेशानी का सबब है। लेकिन कम आत्मविश्वास वाले लोगों की मानसिकता इसके जवाब में यह कहने की रहती है कि हम भी तुम्हारी तरह कट्टरतावाद को अपनाएंगे। भारत को इससे बचना चाहिए। जैसा कि दुनिया के महान राजनेताओं और दार्शनिकों में से एक मार्कस ओरेलियस ने कहा था- हमारा नुकसान करने वाले से अलग बन जाना ही उससे सबसे अच्छा प्रतिशोध है।
एक और चीज जो भारत को करना जरूरी है, वह है आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार। वास्तविक रूप से एक मजबूत देश बनाने के लिए हमें जनसामान्य और मध्यम वर्ग के जीवन को सशक्त बनाना होगा। हाल के वर्षों में भारत की जीडीपी वृद्धि लगभग पूरी तरह से अति धनाढ्य लोगों के हाथों में जा रही है। 2024 में भारत की राष्ट्रीय आय 6.4% बढ़ी है।
यह अपने आप में अच्छी बात है, लेकिन इसमें अंतर्निहित तथ्य यह है कि कई अन्य देशों के विपरीत भारत की उच्च वृद्धि सुपर-रिच की सम्पत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण हुई है। 27 मार्च 2024 को टाइम ने लिखा था कि हाल के वर्षों में भारत में आय की विषमता दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों से भी बदतर हो गई है, जो उच्च-असमानता के लिए जाने जाते थे। 2022-2023 के बीच भारत में अरबपतियों की संख्या 177 से बढ़कर 271 हो गई है।
युवा बेरोजगारी बहुत अधिक है और शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी में भी चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 में बेरोजगार युवाओं में 35.2% शिक्षित थे। 2022 में यह आंकड़ा बढ़कर 66% हो गया है। यदि हमने पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार-सृजन नहीं किया तो वैज्ञानिक नेतृत्व दे सकने वाली आवाज कहां से आएगी?
इनमें से कोई समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। भारत में पर्याप्त बौद्धिक शक्ति है, जिसे आमजन की समृद्धि के लिए नीति-निर्माण के काम में लिया जा सकता है। पर इससे पहले हमें अपनी गलतियों को स्वीकारने का आत्मविश्वास दिखाना होगा। आलोचनाओं और खुली चर्चा की विरासत के दम पर ही मुझे यह आशा है कि हममें उस ताकत को पुन: अर्जित करने की सूझबूझ होगी।
दुनिया में भारत का विशेष स्थान रहा है। शिक्षा प्रणाली ने उसे प्रबुद्ध देश का दर्जा दिलाया। गुटनिरपेक्ष देशों के अगुवाओं में से एक, और लोकतंत्र-धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवाज होने के नाते भारत दुनिया में अलग खड़ा हुआ था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








