कौशिक बसु का कॉलम:  देश की प्रगति केवल जीडीपी से ही नहीं मापी जा सकती
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कौशिक बसु का कॉलम: देश की प्रगति केवल जीडीपी से ही नहीं मापी जा सकती

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7 घंटे पहले

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कौशिक बसु विश्व बैंक के पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट - Dainik Bhaskar

कौशिक बसु विश्व बैंक के पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट

किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति का वर्णन करना जटिल कार्य है। अतीत में विद्वानों ने इस पर किताबें लिखी हैं कि क्या किसी कालखंड में एक देश दूसरे से बेहतर प्रदर्शन कर रहा था या नहीं। लेकिन आज एक ही युक्ति तमाम तरह की चर्चाओं पर हावी हो गई है और उसका नाम है- जीडीपी। य ह एक वर्ष में किसी देश के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को बताती है। कुछ समायोजनों के साथ यह आबादी की कुल आय का भी अनुमान लगाती है।

यह एक बेहद संक्षिप्त मीट्रिक है, जिसका उपयोग किसी देश की आर्थिक सेहत जांचने के लिए किया जाता है। जैसा कि डायने कोयल ने जीडीपी के इतिहास पर अपनी 2014 में प्रकाशित किताब में उल्लेख किया है, इसका उद्भव आर्थिक नीति निर्माण में एक महत्वपूर्ण क्षण था। 1930 के दशक की शुरुआत में साइमन कुजनेट्स द्वारा विकसित जीडीपी की युक्ति ने नीतिगत बहसों में जरूरी ठोसपन ला दिया।

अब राजनेताओं को आर्थिक प्रगति के सबूत के तौर पर सिर्फ ऊंची इमारतों की ओर इशारा करने की जरूरत नहीं थी (हालांकि कई अभी भी ऐसा करते हैं!), अब किसी भी देश के आर्थिक प्रदर्शन का आकलन करने का मतलब बन गया है उसकी जीडीपी-वृद्धि को ट्रैक करना। निश्चित रूप से, राष्ट्रीय कल्याण का आकलन करने के अन्य तरीके भी हैं, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक और विश्व बैंक का साझा समृद्धि संकेतक।

लेकिन जब यह निर्धारित करने की बात आती है कि क्या एक अर्थव्यवस्था दूसरे से बेहतर प्रदर्शन कर रही है, तो जीडीपी (या प्रति व्यक्ति जीडीपी) आज भी एक डिफॉल्ट बेंचमार्क बनी हुई है। लेकिन जहां जीडीपी ने आधुनिक अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं इसकी सीमाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। राजनेता विकास के आंकड़ों का उपयोग सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए करने लगे हैं।

जीडीपी-केंद्रित नीतिगत सोच की कमियों की ओर संयुक्त राष्ट्र की 2021 की रिपोर्ट “अवर कॉमन एजेंडा’ में तब ध्यान खींचा गया था, जब वैश्विक नीति निर्माताओं से मानव-विकास के संकेतकों के व्यापक पहलुओं को अपनाने का आग्रह किया गया था। जीडीपी किसी देश की कुल आय पर ध्यान केंद्रित करके समृद्धि का भ्रम पैदा कर सकती है, जबकि हकीकत यह हो सकती है कि वहां आर्थिक असमानता बढ़ रही हो। किसी देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी तब भी बढ़ सकती है, जब उसकी बहुसंख्यक जनता बदतर स्थिति में हो।

जैसा कि जोसेफ ई. स्टिग्लिट्ज ने अपनी 2010 में प्रकाशित पुस्तक “फ्री-फॉल’ में लिखा है, एक बड़े केक का मतलब यह नहीं कि हर किसी को उसका बड़ा टुकड़ा मिलेगा। जीडीपी को जरूरत से ज्यादा महत्व देना लोकतांत्रिक शासन को भी कमजोर करता है। आखिरकार, सुपर-रिच होने का मतलब सिर्फ ज्यादा कारें, मकान, विमान होना ही नहीं है।

इसका मतलब लोगों की सोच पर असंगत प्रभाव होना भी है। जैसे-जैसे पैसा चंद हाथों में केंद्रित होता जा रहा है, मुट्ठी भर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म यह तय करने लगे हैं कि असंख्य यूजर्स क्या देखें और सुनें। लोगों को लग रहा है कि वे अपनी आवाजें खो रहे हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज लुईस ब्रैंडिस ने कहा था, देश में लोकतंत्र हो सकता है, या बहुत सारी संपत्ति कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो सकती है। पर दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकतीं।

सबसे आखिरी बात, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली और जलवायु-परिवर्तन को गति देने वाली गतिविधियों में शामिल होकर जीडीपी वृद्धि को बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप हमारे वंशजों को एक नष्ट हो चुकी धरती मिलेगी। एक सस्टेनेबल भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए हमें आर्थिक कल्याण को मापने के अपने उपायों में सुधार करना चाहिए।

  • जीडीपी किसी देश की कुल आय पर ध्यान केंद्रित करके समृद्धि का भ्रम पैदा कर सकती है, जबकि हकीकत यह हो सकती है कि वहां आर्थिक असमानता बढ़ रही हो। जीडीपी तब भी बढ़ सकती है, जब जनता बदतर स्थिति में हो।

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