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जब आप किसी वृद्धाश्रम की कल्पना करते हैं, तो आंखों के सामने सफेद वर्दी, शांत गलियारे और बुजुर्गों को दवा देतीं नर्सों के चेहरे आते हैं। लेकिन जापान में आजकल नजारा कुछ अलग है। वहां गलियारों में ‘सिक्स पैक एब्स’ वाले बॉडीबिल्डर्स, टैटू वाले एमएमए फाइटर्स और भारी-भरकम सुमो पहलवान घूमते नजर आ रहे हैं। यह फिल्म की शूटिंग नहीं, बल्कि जापान के गहराते केयर-वर्कर संकट का ‘मस्कुलर’ समाधान है। जापान की तेजी से बूढ़ी होती आबादी और स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी ने वहां की सरकार और निजी संस्थानों को अनोखा प्रयोग करने पर मजबूर कर दिया है- एथलीट्स को बुजुर्गों की सेवा में लगाना। विजनरी जैसी कंपनियां अब इन एथलीटों को खासतौर पर भर्ती कर रही हैं। उन्हें हर महीने करीब 1.3 लाख रुपए मिलते हैं। उन्हें काम के बीच रोजाना 2 घंटे जिम में पसीना बहाने के लिए अलग से पैसे मिलते हैं। कंपनी के सीईओ युसुके निवा कहते हैं,‘हमें इस उद्योग की पुरानी और उबाऊ छवि को बदलना था। बॉडी बिल्डर्स कूल दिखते हैं, ताकतवर होते हैं और बुजुर्गों के बीच नई ऊर्जा भर देते हैं।’ कोची प्रान्त के केयर सेंटर में तो 10 मिक्स मार्शल आर्ट्स (एमएमए) फाइटर्स तैनात हैं। ये दिन में बुजुर्गों को नहलाते हैं और उनके लिए खाना बनाते हैं। रात में अखाड़े में पसीना बहाते हैं। सेंटर के प्रमुख मामिया मात्सुउरा कहते हैं,‘कमरे में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बहुत ऊंचा होता है, पर जब बात देखभाल की आती है, तो ये फाइटर्स बहुत ही कोमल व संवेदनशील हो जाते हैं।’ एथलीट्स को ‘नया जीवन’ एथलीट्स का करिअर अक्सर छोटा होता है। रिटायरमेंट के बाद उन्हें अच्छी नौकरी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ये सेंटर्स उन्हें न सिर्फ स्थिर आय दे रहे हैं, बल्कि रहने के लिए मुफ्त घर, जिम मेंबरशिप व ‘प्रोटीन सप्लीमेंट’ जैसे लुभावने लाभ भी दे रहे हैं। वहीं, बुजुर्गों को ऐसे ‘पोते-पोतियां’ मिल गए हैं जो न सिर्फ ताकतवर हैं, बल्कि जिनका दिल भी उनकी मांसपेशियों की तरह बड़ा है। जुड़ाव भी… बुजुर्गों की मौत से टूट जाते हैं युवा एथलीट इचिनोमिया के केयर सेंटर में 26 साल के ताकुया उसुई आम केयर-वर्कर की तरह नहीं दिखते। वे एक पेशेवर बॉडीबिल्डर हैं। जब वे 65 वर्षीय मादोका यामागूची को उनकी व्हीलचेयर से उठाकर बेड पर लिटाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे जिम में कोई आसान ‘लिफ्ट’ कर रहे हों। उसुई जैसे युवाओं ने यहां मौत की कड़वी हकीकत को भी करीब से देखा है। जब उनकी पसंदीदा मरीज मादोका की मृत्यु हुई, तो वे टूट गए। उसुई कहते हैं,‘उस दिन मुझे अहसास हुआ कि जीवन का हर पल कीमती है।
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