ज्यां द्रेज का कॉलम:  गरीबी से चल रही लड़ाई में एक रास्ता नजर आया है
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ज्यां द्रेज का कॉलम: गरीबी से चल रही लड़ाई में एक रास्ता नजर आया है

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9 घंटे पहले

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ज्यां द्रेज प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री - Dainik Bhaskar

ज्यां द्रेज प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री व समाजशास्त्री

क्या यह सच है कि केरल में अति गरीबी खत्म हो गई है? केरल सरकार का दावा यही है। हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने इस दावे पर सवाल उठाया है। सरकार का दावा उसके एक्स्ट्रीम पॉवर्टी इरेडिकेशन प्रोजेक्ट (ईपीईपी) पर भरोसे का नतीजा है।

इसके तहत ग्राम पंचायतों को अति गरीब परिवारों को पहचानने और उनको कई सरकारी योजनाओं में शामिल करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस बात की संभावना बहुत कम है कि ईपीईपी केरल से अति गरीबी को पूरी तरह खत्म करने में सफल हो पाया है। फिर भी केरल का ईपीईपी एक महत्वपूर्ण पहल है, क्योंकि इसने अति गरीब परिवारों को समर्थन करने का एक रास्ता दिखाया।

भारत में सामाजिक सुरक्षा के लिए कुछ जरूरी प्रावधान होते हैं, जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, जन वितरण प्रणाली, मातृत्व लाभ, बच्चों के लिए आंगनवाड़ी कार्यक्रम और बुजुर्गों के लिए पेंशन। इन योजनाओं में ज्यादातर आबादी शामिल है और यह अच्छी बात है।

पहले सामाजिक सुरक्षा योजनाएं गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों (जिन्हें बीपीएल परिवार कहते हैं) तक ही सीमित थीं। लेकिन बीपीएल परिवारों की पहचान भरोसेमंद नहीं थी, इसलिए बहुत से गरीब परिवार छूट रहे थे। इन योजनाओं को ज्यादातर आबादी तक पहुंचाने से यह समस्या काफी कम हो गई है।

ज्यादा समावेशी सामाजिक सुरक्षा की तरफ बढ़ना एक अच्छा कदम था। लेकिन इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि अति गरीब लोगों पर ध्यान कम हो गया। यह समस्या महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर की नई योजनाओं में भी दिख रही है। सभी महिलाओं के लिए रकम एक जैसी है। गरीब महिलाओं को ज्यादा देने की कोई कोशिश नहीं की जा रही है।

असल में, कुछ राज्यों में इन योजनाओं का यह उल्टा नतीजा हुआ है कि सबसे गरीब महिलाओं को कम पैसा मिलता है। उदाहरण के लिए, झारखण्ड में 50 से कम उम्र की वयस्क महिलाओं को मैया सम्मान योजना के तहत हर महीने 2,500 रु. मिलते हैं, लेकिन बुजुर्ग महिलाओं को वृद्धावस्था पेंशन के तौर पर हर महीने सिर्फ 1,000 रु. मिलते हैं। यह बड़ा अन्याय है।

भारत में सबसे गरीब लोगों के लिए एक ही राष्ट्रीय योजना है, अंत्योदय अन्न योजना। इसे 2001 में शुरू किया गया था। इस स्कीम के तहत, गांव के समुदायों द्वारा सबसे गरीब परिवारों की पहचान की जाती है। वे जन वितरण प्रणाली से हर महीने 35 किलो अनाज लेने के हकदार हैं। कुछ राज्यों में अंत्योदय परिवारों को दाल के राशन जैसे और भी लाभ मिलते हैं।

हाल ही में, केंद्र सरकार ने अंत्योदय योजना में बड़ा बदलाव लाने की घोषणा की। हर महीने 35 किलो अनाज मिलने के बजाय अंत्योदय परिवारों को हर व्यक्ति को 7 किलो के हिसाब से अनाज मिलेगा। यह उचित लग सकता है, लेकिन कई अंत्योदय परिवारों में अकेले रहने वाले बुजुर्ग लोग, एक या दो बच्चों वाली विधवाएं और अन्य छोटे परिवार होते हैं।

अगर यह बदलाव लागू होगा तो ये परिवार और गरीब हो जाएंगे। बड़े परिवारों को फायदा होगा, लेकिन ज्यादा नहीं, जब तक कि वे बहुत बड़े न हों। सरकार पैसे बचाएगी, और शायद यही इस बदलाव का मकसद हो।

अंत्योदय योजना को कम करने के बजाय केंद्र को इसे मजबूत करना चाहिए। अंत्योदय परिवारों की सूची बहुत पुरानी है, ग्राम सभा की मदद से उसका सत्यापन करना चाहिए और अंत्योदय परिवारों की संख्या बढ़ानी भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत अंत्योदय कार्ड के हकदार वर्ग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जैसे आदिम जनजाति और एकल महिलाएं।

अंत्योदय परिवारों को जन वितरण प्रणाली के तहत अनाज, दाल और खाद्य तेल उपलब्ध करना चाहिए। उन्हें आयुष्मान भारत और मैया सम्मान योजना जैसे अन्य योजनाओं में भी शामिल करना चाहिए। केरल में अति गरीबी हो न हो, उसने इस पर ध्यान देने और काम करने का रास्ता तो दिखाया है।

महात्मा गांधी कहते थे कि जब हम कोई आर्थिक नीति बनाते हैं, तो हमें सबसे गरीब व्यक्ति को केंद्र में रखना चाहिए। लेकिन आजकल सबसे गरीब व्यक्ति के बजाय सबसे अमीर व्यक्ति को नीतियां बनाते समय याद रखा जाता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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