राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  अब हमारे नेताओं को ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर नहीं सताता?
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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: अब हमारे नेताओं को ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर नहीं सताता?

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वैसी छवियां एक जमाने में राजनेताओं के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती थीं। दिल्ली में तृणमूल के सांसदों के पाला बदलने की तैयारी के दौरान उन्हें वरिष्ठ भाजपा नेताओं के साथ पूरी तरह से कम्फर्टेबल देखा गया। गोपनीयता बनाए रखने की कोशिश तक नहीं की गई। महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी विधायक चार्टर्ड विमानों से यात्रा करते दिखे, आलीशान होटलों में ठहरे और भारी सुरक्षा घेरे में अपने राजनीतिक भविष्य पर बातचीत करते रहे। वे ऐसे जनप्रतिनिधियों जैसे नजर नहीं आ रहे थे, जो अपनी अंतरात्मा के किसी संघर्ष से जूझ रहे हों। इसके बजाय वो किसी कॉर्पोरेट मामले पर बातचीत कर रहे एग्जीक्यूटिव्ज़ जैसे ज्यादा लग रहे थे! यहां चौंकाने वाली बात दलबदल नहीं है। क्योंकि भारतीय राजनीति तो दशकों से दलबदल देखती आ रही है। ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि अब आम धारणा की कोई चिंता तक दिखाई नहीं देती। विचारधारा में अचानक बदलाव क्यों कर आया, इस पर कोई व्याख्या नहीं दी जाती। मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास नहीं किया जाता कि ऐसा करने के पीछे कोई महत् उद्देश्य है। संदेश जैसे साफ था : राजनीति एक लेन-देन है और हर कोई सौदे की शर्तें जानता है। अब तो राज्यसत्ता के संसाधनों तक पहुंच भी इस सौदे का हिस्सा दिखाई देती है। जैसा कि एक शिवसेना सांसद ने कहा : अगर मुझे अपने निर्वाचन क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए विकास-निधि चाहिए तो मैं और क्या करता? दलबदल को अब चुनावी जनादेश से विश्वासघात के रूप में नहीं देखा जाता। यह सामान्यीकृत हो चुका है और सत्ता हासिल करने की कोशिश में एक साधन के रूप में स्वीकार लिया गया है। क्या कांग्रेस के शासन में दलबदल नहीं हुए थे? हां, हुए थे। दलबदल भारतीय लोकतंत्र जितना ही पुराना है। पहले भी विपक्षी सरकारों को बर्खास्त किया गया, विधायकों ने पद हासिल करने, गुटीय विवाद सुलझाने या उस समय की प्रभावशाली पार्टी के साथ जुड़ने के लिए पाला बदला। राजनीतिक अवसरवाद फलता-फूलता रहा। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब दलबदल का चरित्र बदल गया है। कांग्रेस युग में दलबदल एक प्रभुत्वशाली पार्टी व्यवस्था का लक्षण था। जबकि आज यह एक प्रभुत्वशाली पार्टी व्यवस्था बनाने और बनाए रखने की रणनीति बन चुका है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समकालीन भारतीय राजनीति में आए सबसे बड़े बदलावों में से एक को समझने में मदद करता है। पिछले एक दशक में भाजपा स्वतंत्र भारत में देखी गई सबसे प्रभावशाली चुनावी मशीनों में से एक बनकर उभरी है। इसकी संगठनात्मक शक्ति, वित्तीय संसाधन, संचार तंत्र और नेतृत्व संरचना अभूतपूर्व है। इसकी चुनावी सफलता को स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन इसने एक नई राजनीतिक सोच को भी जन्म दिया है। चुनाव जीतना अब केवल सत्ता चलाने का माध्यम नहीं रह गया है। क्षेत्र-विस्तार का उद्देश्य बन गया है। इस दृष्टिकोण से दलबदल अब अपवाद नहीं, अधिग्रहण बन चुके हैं। जरा पैटर्न पर गौर करें। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के जाने के बाद कांग्रेस सरकार गिर गई। महाराष्ट्र ने पहले शिवसेना में विभाजन देखा और फिर राकांपा में टूट हुई। पूर्वोत्तर में भाजपा ने प्रतिद्वंद्वी दलों के नेताओं और विधायकों को साथ लेकर अपना विस्तार किया है। इस सबका लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी दलों को संरचनात्मक रूप से कमजोर करना और सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक पहुंच को लगातार बढ़ाना है। जो भाजपा कभी वैचारिक प्रतिबद्धता और अपने कैडर की निष्ठा पर गर्व करती थी, वही अब विरोधी खेमों से बड़े पैमाने पर नेताओं को शामिल कर रही है। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर की भाजपा मुख्य रूप से गठबंधनों, सामाजिक समीकरणों और मतदाताओं तक पहुंच के माध्यम से विस्तार करना चाहती थी। वाजपेयी समझते थे कि राजनीतिक विस्तार सहमति और मनुहार के माध्यम से होता है। लेकिन आज ऐसा नहीं है। दलबदल विरोधी कानून को भी लगातार दरकिनार किया जा रहा है। बंगाल में एक अल्पज्ञात राजनीतिक दल- नेशनलिस्ट सिटीजनशिप पार्टी ऑफ इंडिया का उपयोग कानून के दायरे से बचते हुए दलबदल को आसान बनाने के लिए किया गया। दलों में विभाजन और अपात्रता से जुड़े मामले अदालत में महीनों और कभी-कभी वर्षों तक लंबित रहते हैं। जब तक फैसला आता है, तब तक सरकारें अपना कार्यकाल चला चुकी होती हैं और मंत्री पद का लाभ उठा चुके होते हैं। पार्टियां विकसित होती हैं। गठबंधन बदलते हैं। नेता भी अपने विचार बदल सकते हैं। लेकिन यदि दलबदल सत्ता हासिल करने के साधन बन जाएं तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है। वोटर किसी एक उम्मीदवार का ही चुनाव नहीं करते। वे एक पार्टी, चुनाव चिह्न, कार्यक्रम और राजनीतिक दृष्टिकोण को भी चुनते हैं। उनके इस जनादेश को चुनाव के बाद राजनीतिक जोड़-तोड़ के जरिये बदल देना अनैतिक है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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