9 घंटे पहले
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हम ऐसी प्रजाति हैं, जो सहमति को स्नेह समझती है और अस्वीकृति को खंडन। जब लोग हमसे असहमत होते हैं या हमें इंकार करते हैं, तो हम उसे अक्सर शत्रुता का प्रमाण मान लेते हैं। यह अवश्य हो सकता है कि आपकी प्रतिक्रिया से दूसरे उदास या निराश हों। इसे टाला नहीं जा सकता। आपका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि उस निराशा का रूपांतरण अपमान तक न पहुंचे। जब आप असहमति व्यक्त करते हैं, तो खुद पर होने वाली अतिरंजित नकारात्मक व्याख्याओं से बचने के लिए ये सुझाव मददगार हो सकते हैं…
1) अपनी सोच बताइए, अपना तर्क साझा करिए किसी को भी एकदम से तुरंत ही ना मत कहिए। सबसे पहले अपना तर्क साझा कीजिए। अपने तथ्य बताइए। हो सके तो अपने निर्णय के पीछे की वजह समझाइए। ना कहते समय अपनी स्थिति या भावना समझाना, जैसे ‘मैं अभी समय नहीं निकाल पा रहा हूं।’ इससे आप सामने वाले को दोष नहीं देते, केवल अपनी वजह बताते हैं, जिससे रिश्ता बिगड़ता नहीं। बात साफ रहती है।
2) मूल्यों-समझौतों को सहज स्वीकार कीजिए दूसरों को यह भी बताइए कि आप उन मूल्यों के प्रति सहानुभूति रखते हैं, जो आपके निर्णय के साथ पूर्णतः समझौता कर सकते हैं। फैसले ज्यादातर काले-सफेद नहीं हुआ करते। फैसले न तो बिल्कुल सही होते हैं और न ही बिल्कुल गलत ही होते हैं। जहां तक बने और जितना बने, उन सार्थक मूल्यों का सम्मान कीजिए, जो दूसरों की तरफ से प्रेरित हो सकते हैं। उन्हें स्वीकार करें।
3) संकोचपूर्ण लेकिन आत्मविश्वासी बने रहें ‘हम जो एकमात्र तर्कसंगत निष्कर्ष निकाल सकते हैं वह है…’ या ‘सही उत्तर यह है…’ जैसी कट्टर सूचनाएं देने से आप लोगों को अलग कर सकते हैं, उन्हें समझा नहीं सकते। इसके बजाय आप ‘मैंने यह निष्कर्ष निकाला है…’ या ‘मेरा मानना है…’ जैसे वाक्य बोल सकते हैं। ये आपके अंदर ठहराव और विनम्रता का मिश्रण दिखाते हैं और अनावश्यक संघर्ष को जन्म नहीं देते।
4) ‘ना’ कहने की अनुमति मांग सकते हैं किसी उच्च पदस्थ व्यक्ति को इंकार करते समय पहले उनकी अनुमति मांगना प्रभावी हो सकता है। उदाहरण के लिए आप कह सकते हैं- ‘सर/मैडम, आपने मुझसे नया प्रोजेक्ट लेने को कहा है। मेरा विचार है कि मेरे लिए यह लेना ठीक नहीं होगा और मैं अपनी वजहें साझा करना चाहूंगा। अगर आप नहीं सुनना चाहते तो मैं इसे स्वीकार कर लूंगा और अपनी पूरी कोशिश करूंगा। आप क्या चाहेंगे?’








