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डिजिटल पुनर्जन्म ; पैसे देकर मृतक परिजन से चैट करें: डिजिटल डेटा के आधार पर मृतकों का वर्चुअल रूप बना रही टेक कंपनियां

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इस दुनिया से जा चुका आपका कोई करीबी तकनीक के जरिए आपसे बातें करने लगे। फोन पर उसकी आवाज में जवाब मिले। वह पुरानी बातें याद रखे और परिवार के सदस्य से ऐसे बात करे जैसे अभी जीवित हो। एआई ने इस कल्पना को संभव कर दिया है। टेक कंपनियां मृतक के पुराने मैसेजेस, फोटो, वीडियो और वॉयस रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल कर उसका डिजिटल क्लोन बना रही हैं। एआई के जरिए ग्रीफबॉट, डेथबॉट या थानाबॉट मृत व्यक्ति के सोशल मीडिया पर मौजूद डेटा (मैसेज, तस्वीर, वीडियो, आवाज की रिकॉर्डिंग) से उसका वर्चुअल रूप तैयार करती हैं। इससे मृतक से उसके परिजन या दोस्त बातचीत कर सकते हैं। यह तेजी से उभर रहे ‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ यानी मृत्यु के बाद डिजिटल दुनिया का नया कारोबार बन रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मृतकों से बातचीत का कारोबार 2024 में 1.87 लाख करोड़ रु. था। 2030 तक इसके 7.61 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। बनाते हैं मृतक के बॉट्स मृतक व्यक्ति ने जिंदगी में जितने भी वॉट्सएप मैसेज, ईमेल, वॉयस नोट्स और सोशल मीडिया पोस्ट छोड़े हैं, एआई एल्गोरिद्म उन सभी डेटा को प्रोसेस करता है। इसके आधार पर बॉट्स’ तैयार किए जाते हैं। सब्सक्रिप्शन मॉडल यह सेवा कोई मुफ्त सुविधा नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट के पास व्यक्ति के सोशल डेटा से बॉट बनाने का 2020 से पेटेंट मौजूद है। दक्षिण कोरिया की कंपनी ‘डीपब्रेन एआई’ जैसे स्टार्टअप मृतक के थ्रीडी अवतार बनाने के लिए लगभग 43 लाख रु. तक फीस लेती है। डिजिटल डेथ भी अगर परिजन हर महीने का सब्सक्रिप्शन चार्ज देना बंद कर देते हैं, या कंपनी बंद होती है, तो एआई अवतार काम करना बंद कर देता है। विशेषज्ञ इसे इंसान की ‘तीसरी मौत’ या ‘डिजिटल डेथ’ कह रहे हैं। यॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रो. रसेल बेल्क कहते हैं कि टेक कंपनियां भावनाओं को भुनाने का नया बाजार बना रही है। खतरा – आपकी संवेदनाओं का मालिकाना हक कंपनी के पास मृतक से बातचीत कराने वाली हीयरआफ्टरएआई डिजिटल स्मृति सेवाओं के लिए ~17 हजार फीस लेती है। हालांकि कंपनी ने कारोबार बंद करने की घोषणा कर चुकी है। यू, वनली वर्चुअल ‘वर्सोना’ नाम से टेक्स्ट और आवाज आधारित डिजिटल व्यक्तित्व; मृत परिजन से बातचीत कराती है। इसके लिए प्रति माह 1900 रु. फीस है। बहरहाल, तकनीक के खतरे भी हैं। प्रो. रसेल बेल्क आगाह करते हैं, ‘यह मृतक को सहेजती नहीं है, बल्कि कंपनियों के एल्गोरिद्म, परिवार की पसंद और सर्वर के कोड्स को मिलाकर नया इंसान गढ़ती है। जब किसी का दुख सर्वर पर निर्भर हो जाए, तो समझ लें कि आपकी संवेदनाओं का मालिकाना हक किसी कंपनी के पास है।



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