डिजिटल पेरेंटिंग का साइड इफेक्ट:  अमेरिका में 52% पैरेंट्स हर वक्त बच्चों पर रख रहे नज़र; बच्चे भी फैसले लेने से डरने लगे
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डिजिटल पेरेंटिंग का साइड इफेक्ट: अमेरिका में 52% पैरेंट्स हर वक्त बच्चों पर रख रहे नज़र; बच्चे भी फैसले लेने से डरने लगे

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मोबाइल फोन की एक सेटिंग माता-पिता को हर पल यह जानने की सहूलियत देती है कि उनका बच्चा कहां है। अमेरिका-यूरोप समेत कई देशों में युवा की लगातार डिजिटल निगरानी कर रहे माता-पिता के लिए सुकून कम, बेचैनी ज्यादा बढ़ रही है। वहीं, वयस्क बच्चे भी फैसले, जोखिम नहीं ले पा रहे हैं। अमेरिका में 52% माता-पिता यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे अपने 18 से 25 साल के वयस्क बच्चों की मोबाइल या एप से लोकेशन ट्रैक करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ सीएस मॉट चिल्डेंस हॉस्पिटल के इस सर्वे की को-डायरेक्टर डॉ. सारा क्लार्क कहती हैं, ‘सबसे बड़ा खतरा तब होता है, जब माता-पिता इस जानकारी के आधार पर बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी को मैनेज करने लगते हैं और कई बार उनकी क्लास, काम या डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तक पर सवाल करते हैं।’ गलतफहमी से बेवजह का तनाव सारा क्लार्क ने एक वाकया बताया। एक पैरेंट ने अपने कॉलेज में पढ़ रहे बेटे को मैसेज किया, ‘क्या तुम ठीक हो? तुम सुनसान गली में क्या कर रहे हो?’ असल में ट्रैकिंग एप की गड़बड़ी के कारण लोकेशन वैसी दिख रही थी, जबकि युवक लॉबी में खड़ा था और खाना आर्डर कर रहा था। ऐसी घटनाएं पैरेंट्स में बेवजह तनाव पैदा करती हैं। 23% माता-पिता यह स्वीकारते भी हैं कि लगातार ट्रेकिंग की आदत उन्हें और ज्यादा बेचैन कर देती है। डॉ. सारा के मुताबिक, ये ‘हॉवरिंग पैरेंटिंग’ है। इससे युवा खुद फैसले लेने, जिम्मेदारी निभाना और जवाबदेही नहीं सीख पाते। टेम्पल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक प्रो. लॉरेंस स्टीनबर्ग चेताते हैं कि अधिक निगरानी से युवाओं में आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने और जोखिम संभालने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। ‘ओवर-पैरेंटिंग’ से माता-पिता और बच्चों में भरोसे की जगह तनाव बढ़ा सकता है। ऐसा न हो कि युवा खुद सुरक्षित रहना सीख ही न पाएं जो माता-पिता ट्रैकिंग नहीं करते, उनमें से 65% इसे निजता का हनन मानते हैं। जबकि 51% को डर है कि इससे बच्चे की जिम्मेदारी की समझ प्रभावित होगी। रिसर्च यह भी बताती है कि निगरानी दो-तरफा है। करीब आधे मामलों में वयस्क बच्चे भी माता-पिता की लोकेशन ट्रैक करते हैं। डॉ. सारा क्लार्क ​कहती हैं कि डिजिटल निगरानी में सूझबूझ जरूरी है। इसका ध्यान रखें कि सुरक्षा की चाह में कहीं ऐसा न हो कि बच्चे बड़े होने पर भी खुद सुरक्षित रहना सीख ही न पाएं। सुरक्षा, निजता और आजादी के बीच संतुलन को लेकर बातचीत न हो तो यह तकनीक रिश्तों में दूरी भी पैदा कर सकती है।



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