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- Derek O’Brien’s Column: It’s Our Responsibility To Protect Our Country’s Independent Institutions
3 घंटे पहले
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डेरेक ओ ब्रायन लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता हैं
एक जिम्मेदार विपक्ष के तौर पर हमारा दायित्व है कि हम स्वतंत्र संस्थाओं की रक्षा करें। संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, आरबीआई, जांच एजेंसियां- इन्हें कमजोर करने और इनकी स्वायत्तता को समाप्त करने की हर कोशिश को हमें रोकना होगा। ये ही वो संस्थाएं हैं, जो नागरिक को संरक्षण देती हैं।
संविधान ने भी इन्हें कार्यपालिका पर अंकुश लगाने की ताकत दी है। लेकिन सबसे बढ़कर हमें अपने शैक्षणिक संस्थानों की रक्षा करनी होगी, क्योंकि विचारों को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले उन्हीं को निशाना बनाया जाता है। अगर युवाओं के दिमाग कुंद हो जाएंगे तो यह देश के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हो सकते।
उच्च शिक्षा के संस्थान दो तरह के होते हैं। एक, जिन्हें राज्यसत्ता ने बनाया; और दूसरे, जिन्हें असाधारण विज़न वाले व्यक्तियों ने किसी बड़े विचार के आधार पर स्थापित किया। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की परिकल्पना होमी जहांगीर भाभा ने की थी। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस जेएन टाटा की कल्पना का परिणाम था।
बीएचयू को पं. मदन मोहन मालवीय और एएमयू को सर सैयद अहमद खां ने रचा था। बंगाल ने भी एक प्रबुद्ध राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण संस्थानों का योगदान दिया है, जैसे रबीन्द्रनाथ ठाकुर का विश्व-भारती विश्वविद्यालय और पीसी महालनोबिस का भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई)। हमारे शैक्षिक नवरत्नों में ये संस्थान सदैव अग्रगण्य होंगे।
लेकिन पिछले दशक में हमने देखा है कि स्वायत्त संस्थानों पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ा है। आईआईएम को ही लें। द इंडियन इंस्टिट्यूट्स ऑफ मैनेजमेंट एक्ट, 2017 के तहत उन्हें स्वायत्तता दी गई थी। उनके पास अपने निदेशकों को चुनने और नीतियां गढ़ने की शक्ति थी। लेकिन आईआईएम संशोधन कानून, 2023 ने इन अधिकारों को उनसे छीन लिया।
अब निदेशकों की नियुक्ति और अन्य निर्णयों के लिए शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होगी। या विश्व-भारती का उदाहरण लें। रबीन्द्रनाथ ने इसकी स्थापना खुलेपन, शिक्षा और मानवतावाद की बुनियाद पर की थी। लेकिन आज उसके नाजुक इकोसिस्टम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के ढांचे में ढाला जा रहा है।
फैकल्टी सदस्यों को राष्ट्रीय कर्मयोगी कार्यक्रम के तहत प्रशासनिक प्रशिक्षण के लिए भेजा जा रहा है। या फिर कॉमन यूनिवर्सिटी एन्ट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) की बात करें। अपनी प्रवेश प्रणाली को स्वयं तय करने वाले विश्वविद्यालयों को केंद्रीकृत प्रणाली अपनाने के लिए बाध्य किया गया। यूनिवर्सिटी में कौन प्रवेश करता है और कैसे प्रवेश करता है, इसका नियंत्रण केंद्र ने अपने हाथों में ले लिया।
हाल ही में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परामर्श के लिए आईएसआई ड्राफ्ट विधेयक, 2025 जारी किया है। इसमें आईएसआई को एक पंजीकृत सोसाइटी से बदलकर केंद्र सरकार के पूर्ण नियंत्रण वाला वैधानिक निकाय बनाने का प्रस्ताव है।
इसके तहत इसमें पहले की लोकतांत्रिक संरचना वाली 33-सदस्यीय परिषद को समाप्त किया जाएगा। उसकी जगह 11-सदस्यीय संचालन बोर्ड बनेगा, जिसके सभी सदस्य केंद्र द्वारा नामित होंगे। पहले की अकादमिक परिषद- जिसमें सभी प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व था- समाप्त कर दी जाएगी। प्रोफेसरों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाएगा।
निदेशक का चयन सरकार द्वारा नियंत्रित एक समिति द्वारा होगा। डीन, रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति बोर्ड द्वारा की जाएगी और बोर्ड खुद केंद्र सरकार द्वारा चुना जाएगा। दूसरे शब्दों में सरकार ही तय करेगी कि आईएसआई का संचालन कौन करेगा।
चिंता की और बातें हैं। 1959 के अधिनियम में उल्लेख है कि आईएसआई का मुख्यालय कोलकाता में है। लेकिन नए ड्राफ्ट में इसका कोई उल्लेख नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रशासनिक केंद्र को अब कहीं भी स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे संघीय ढांचे की भावना पर भी सवाल खड़े होते हैं।
आईएसआई कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह बंगाल पुनर्जागरण की उस परंपरा का परिणाम है, जिसने बौद्धिक साहस, वैज्ञानिक अनुशासन और मानवतावादी मूल्यों को जन्म दिया था। इसके संस्थापक महालनोबिस आधुनिक भारत की सांख्यिकी प्रणाली के निर्माता थे।
उन्होंने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की स्थापना की। 29 जून को उनके जन्मदिवस पर सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है। आईएसआई की असली शक्ति उसकी स्वतंत्रता में रही है- वह माहौल जिसमें सांख्यिकीविद्, अर्थशास्त्री, कंप्यूटर वैज्ञानिक, गणितीय चिंतक बिना किसी नौकरशाही हस्तक्षेप के काम कर सकते थे। अब वही स्वतंत्रता खतरे में है।
केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा संस्थानों को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही है। लेकिन अगर उनसे जुड़े तमाम फैसले केंद्र ही करेगा तो राज्यों की भूमिका क्या केवल कैम्पस उपलब्ध कराने वाले की होकर रह जाएगी? (ये लेखक के अपने विचार हैं। इसके सहायक शोधकर्ता आयुष्मान डे और यश जैन हैं)








