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- Virag Gupta’s Supreme Court Column: Our Privacy And Confidentiality Are Under Threat From All Sides.
5 घंटे पहले
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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक
एक समय था जब पूर्व पीएम चंद्रशेखर के घर में पुलिस जवानों की तैनाती और कथित जासूसी के बाद राजनीति में भूचाल आ गया था। लेकिन अब स्मार्टफोन और दूसरे उपकरणों के माध्यम से हमारे जीवन में डिजिटल ताका-झांकी के बावजूद किसी को उलझन नहीं हो रही।
ऑपरेशन सिंदूर के समय हमारे चैनलों में प्रसारित खबरों को पाकिस्तान भेजने वालों के खिलाफ तो सरकारी गोपनीयता कानून के उल्लंघन और जासूसी के तहत मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। लेकिन जासूसी को बढ़ाने वाले बड़े खिलाड़ियों पर कार्रवाई नहीं होती।
1. स्मार्टफोन : सवालों के जवाब देने वाला एलेक्सा हमारी बातचीत को सुनने के साथ रिकॉर्ड भी करता है। मोबाइल कम्पनियां और एप्स कानूनी और गैर-कानूनी तरीके से यूजर्स के डेटा को हासिल करके मुनाफा कमा रहे हैं। इन डेटा में लोकेशन, कैमरा, माइक्रोफोन, कॉल लॉग्स, फोटो, हेल्थ डेटा, चैट्स, मैसेज आदि शामिल हैं। इस डेटा के आधार पर बनने वाली प्रोफाइल से विज्ञापन और मार्केटिंग की रणनीति तैयार होती है। 2. प्रिज्म : अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने ऑपरेशन प्रिज्म के तहत फेसबक, गूगल, एपल, माइक्रोसॉफ्ट, याहू, स्काइप समेत 9 कम्पनियों के जरिये भारत की 6 अरब से ज्यादा जानकारियों को गैर-कानूनी तरीके से हासिल किया था। स्नोडेन के खुलासे के बावजूद यूपीए सरकार ने टेक कम्पनियों पर कार्रवाई नहीं की। एनडीए सरकार ने डेटा के गैर-कानूनी इस्तेमाल करने वाले चीनी एप्स पर प्रतिबंध जरूर लगाया, पर ऑनलाइन गेमिंग और लोन एप्स की आड़ में जासूसी करने वाले एप्स पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही।
3. गूगल : अजमल कसाब ने गूगल अर्थ की मदद से मुम्बई आतंकी हमलों की साजिश रचना स्वीकारा था। अमेरिका और चीन समेत कई देशों में परमाणु ठिकानों जैसी संवेदनशील इमारतों का 3-डी व्यू दिखाने पर प्रतिबंध है। 3-डी व्यू से जासूसी को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम, इसरो और भारतीय सेना ने सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। इसके बावजूद गूगल अर्थ में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी इमारतों और सैन्य ठिकानों की तस्वीरों को देखा जा सकता है। अब इलॉन मस्क की कम्पनी के सैटेलाइट इंटरनेट को अनुमति देने से म्यांमार से लगी सीमा सहित अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में जासूसी के अंदेशे से राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा खतरा हो रहा है।
4. फेसबुक : मेटा के तीन प्लेटफॉर्म फेसबुक, वॉट्सएप और इंस्टाग्राम डेटा शेयरिंग और डेटा माइनिंग के साथ डेटा का व्यवसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक से जुड़ी कैम्ब्रिज एनालिटिका ने भारतीयों के डेटा की जासूसी करके चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। कैलिफोर्निया की अदालत में दायर मुकदमे के अनुसार इजराइल के पेगासस सॉफ्टवेयर के माध्यम से वॉट्सएप को जासूसी के लिए हैक किया जाता था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद गठित जांच समिति को साइबर सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी रिपोर्ट देनी थी। लेकिन उस मामले में भी टेक और टेलीकॉम कम्पनियों पर कार्रवाई नहीं हुई।
5. सरकारी एप्स : साइबर अपराध और मोबाइल चोरी को रोकने के लिए संचार साथी को अनिवार्य बनाने का आदेश वापस हो गया है। लेकिन आरोग्य सेतु, डिजी यात्रा, माय गवर्नमेंट, एम-परिवहन, एम-आधार, रेलवन जैसे कई सरकारी एप्स में करोड़ों भारतीयों के संवेदनशील डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त कानून का अभाव है। सीसीटीवी से हो रही जासूसी को रोकने के लिए भी ठोस नियम नहीं बने हैं।
6. नियमन : परंपरागत टेलीफोन में अवैध तरीके से बातचीत को सुनने या रिकॉर्ड करने को स्वतत्रंता और जीवन के अधिकार का बड़ा उल्लंघन माना जाता था। पीयूसीएल मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त गाइडलाइंस के अनुसार गृह सचिव के अधिकार और जवाबदेही तय किए गए थे। लेकिन पुट्टास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसले के बावजूद पिछले 8 सालों से डेटा सुरक्षा कानून लागू नहीं हो रहा।
रिजर्व बैंक ने पुराने 9450 सर्कुलर में से बेकार के हटाकर 238 नए मास्टर आदेशों का संकलन तैयार किया है। इसी तरह से साइबर अपराध और डिजिटल जासूसी रोकने के नाम पर हो रहे दावों के अनुसार सरकार को डिजिटल संहिता के प्रकाशन की पहल करनी चाहिए।
मोबाइल कम्पनियां और एप्स यूजर्स के डेटा को हासिल कर मुनाफा कमा रहे हैं। इन डेटा में लोकेशन, कैमरा, माइक्रोफोन, कॉल लॉग्स, फोटो, हेल्थ डेटा, चैट्स, मैसेज आदि शामिल हैं। इससे मार्केटिंग रणनीति तय होती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








