डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम:  लम्बी चुप्पी के विरुद्ध स्त्रियों के विद्रोह को सदैव याद रखें
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डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम: लम्बी चुप्पी के विरुद्ध स्त्रियों के विद्रोह को सदैव याद रखें

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यह मेरे द्वारा लिखे गए कठिनतम कॉलमों में से एक है। इसमें सार्वजनिक नीतियों पर बात नहीं की गई है। किसी योजना का विश्लेषण नहीं है। टैरिफ, चुनाव या संसद के किसी सत्र पर टिप्पणी भी नहीं है। यह कॉलम चुप्पी के बारे में है। चुप्पी, जो लंबे समय तक बनी रही थी, जिसे कभी साहस के साथ तोड़ा गया था और जो अब चुपचाप लौटती हुई मालूम होती है। आठ साल पहले, भारत में महिलाओं ने आवाज उठाई थी। उन्होंने गहरी सांस ली, खुद को संभाला और ताकतवरों के सामने खड़े होकर सच कहा। ये सच इस उम्मीद के साथ बोले गए थे कि वे न केवल भ्रमों को मिटाएंगे, बल्कि उन्हें सम्भव बनाने वाली संरचनाओं को भी ध्वस्त करेंगे। ‘मी-टू’ आंदोलन महज एक क्षणिक घटना नहीं था, बल्कि आत्ममंथन और जवाबदेही का निर्णायक क्षण था। वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने ‘मी-टू’ की लड़ाई कानूनी मोर्चे पर लड़ी थी। उन्होंने मुझसे कहा- मी-टू आंदोलन इस आधार पर खड़ा था कि पीड़िताएं उस चुप्पी को समाप्त करें, जिसने कार्यस्थलों और अन्य जगहों पर सत्ता के नियमित दुरुपयोग को कायम रखा था। लेकिन सच बोलने के लिए अनेक महिलाओं को गंभीर चुनौतियां झेलनी पड़ीं। उन पर मुकदमे तक दायर किए गए। जिन मामलों में पीड़िताएं कानूनी रूप से सफल भी रहीं, उनमें भी पुरुषों को कोई ठोस नुकसान नहीं उठाना पड़ा। इसके उलट, हमने इन पुरुषों काे उनके प्रभाव-क्षेत्रों में फिर से स्थापित होते देखा है। कुछ मामलों में यौन हिंसा की शिकायत के मामले न्यायिक जांच के फॉरेंसिक मानकों पर खरे नहीं उतर सके- जांच में छोड़ी गई खामियों या अयोग्यता के चलते। साथ ही, पीड़िताओं को लगातार सार्वजनिक बदनामी का भी सामना करना पड़ा। ध्यान देने वाली बात है कि पीड़िताओं और आरोपितों के बीच सामाजिक पूंजी और वर्ग-शक्ति का बहुत बड़ा अंतर था। आलोचक अकसर यह कहकर बचाव में उतर आते हैं कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समस्या का भारत ने पहले ही 2013 के पॉश कानून के जरिए समाधान कर लिया है। यह कानून यकीनन अपने समय में प्रगतिशील था- उसने एक औपचारिक नियोक्ता और निश्चित कार्यस्थल की परिकल्पना की थी। लेकिन आज की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से- गिग इकॉनोमी, मीडिया, मनोरंजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म- संविदा, फ्रीलांस या अनौपचारिक व्यवस्थाओं पर चलते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय की एक अधिवक्ता ने कहा- हम सबने अपने पेशेवर जीवन में किसी न किसी रूप में इस बुराई का सामना किया है। कानून की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। हम किससे शिकायत करें? शी-बॉक्स का अता-पता नहीं है। पॉश ट्रेनिंग की अनदेखी की जाती है, क्योंकि धारणा बना दी गई है कि इससे महिलाएं कानून का ‘दुरुपयोग’ करना सीख लेंगी। भारत में ऐसे कानूनी प्रावधान नहीं हैं, जो सत्ता-संबंधों के संदर्भ में यौन दुराचार के सार्वजनिक खुलासों को संबोधित करते हों। ‘मी-टू’ के खुलासों पर भी हमने कोई नया कानूनी ढांचा विकसित नहीं किया। इसके बजाय मौजूदा कानून- विशेषकर मानहानि संबंधी प्रावधान- ऐसे मामलों में आगे की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करने लगते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी ने वर्तमान परिदृश्य के संदर्भ में कहा है- जो पुरुष मौजूदा सत्ता-व्यवस्था से जुड़े हैं और जिन्होंने वर्तमान तंत्र के भीतर स्वीकार्यता बना ली है, वे चुपचाप अपने जीवन को फिर से स्थापित कर चुके हैं। लेकिन जिन्हें व्यवस्था-विरोधी माना गया, उन्हें अदालत से क्लीन चिट मिलने के बाद भी वापसी करने का अवसर नहीं दिया गया है। गहरे पितृसत्तात्मक संस्कार ही मी-टू आंदोलन के आरोपितों के खिलाफ समाज में वास्तविक आक्रोश के अभाव का कारण हैं। वास्तव में पीड़ा या आक्रोश के बजाय, उलटे एक तरह की व्यंग्यात्मक सहमति दिखाई देती है- आंख दबाकर दी गई स्वीकृति या हल्की मुस्कान के साथ चीजों को टाल देने की प्रवृत्ति, मानो दुराचार की घटनाएं महज ‘लॉकर रूम’ का मजाक हों। जब किसी शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति सार्वजनिक रूप से महिला नेताओं का उपहास या उनकी उपेक्षा करता है, तब उसके खिलाफ हमारे नागरिक समाज का प्रतिरोध और स्पष्ट निंदा कहां रहती है? जब महिलाओं के साथ गम्भीर प्रताड़ना के आरोप झेल रहे लोगों को भी साहित्य उत्सवों और संस्कृति समारोहों में अहर्निश आमंत्रित किया जाता रहता है, तब तो हमें इस कठोर सच का सामना करना ही पड़ेगा कि- स्त्रीद्वेष आज समाज में मुख्यधारा का हिस्सा बन चुका है! भारत में ऐसे कानूनी प्रावधान नहीं हैं, जो सत्ता-संबंधों के संदर्भ में यौन दुराचार के सार्वजनिक खुलासों को संबोधित करते हों। वास्तव में, ‘मी-टू’ के खुलासों के बाद भी हमने कोई नया कानूनी ढांचा विकसित नहीं किया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं। लेख की सहायक शोधकर्ता चाहत मंगतानी और वर्णिका मिश्रा हैं)



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