रुचिर शर्मा का कॉलम:  ट्रम्प से नाराजगी के बावजूद अमेरिका में खूब पैसा आ रहा
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रुचिर शर्मा का कॉलम: ट्रम्प से नाराजगी के बावजूद अमेरिका में खूब पैसा आ रहा

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5 घंटे पहले

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रुचिर शर्मा ग्लोबल इन्वेस्टर व बेस्टसेलिंग राइटर - Dainik Bhaskar

रुचिर शर्मा ग्लोबल इन्वेस्टर व बेस्टसेलिंग राइटर

अमेरिका के मामले में आज दुनिया भर के निवेशकों का रवैया यह है कि दिन भर आलोचना करो, रात भर खरीदारी करो। हाल ही में एशिया, यूरोपो और मध्य-पूर्व की यात्रा के दौरान मुझे महसूस हुआ कि ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिका को लेकर कितनी शिकायतें हैं।

चाहे टैरिफ का मुद्दा हो, ग्रीनलैंड की बात हो या पुरानी विश्व-व्यवस्था के प्रति उदासीनता की- दुनिया भर में अमेरिका के प्रति नकारात्मक धारणा बढ़ रही है। लेकिन जब मैं न्यूयॉर्क लौटा और आंकड़ों पर नजर डाली, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखी।

भले ही अमेरिका के प्रति राय नकारात्मक होती जा रही हो, पैसा पहले से कहीं अधिक मात्रा में अमेरिका की ओर बह रहा है। पिछले वर्ष विदेशियों ने अमेरिकी फाइनेंशियल एसेट्स में 1.6 ट्रिलियन डॉलर का निवेश किया, जिसमें करीब 700 अरब डॉलर तो केवल शेयर बाजार में लगाए गए। ये दोनों ही रिकॉर्ड आंकड़े हैं और बीते वर्षों की तुलना में काफी अधिक हैं। अमेरिकी कॉर्पोरेट बॉन्ड के मामले में भी यही रुझान दिखा, जहां विदेशी खरीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।

तो सवाल यह है कि जिस देश के प्रति सार्वजनिक रूप से नाराजगी बढ़ती जताई जा रही है, उसमें इतनी मात्रा में निवेश क्यों हो रहा है? इसका एक कारण इनर्शिया है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से अभी तक अमेरिका का प्रदर्शन दुनिया के अधिकांश देशों से बेहतर रहा है। निवेशक बीते प्रदर्शन का पीछा करते हैं। उन्होंने मान लिया है कि विशाल आकार और लिक्विडिटी के कारण फिलहाल तो अमेरिकी बाजारों में निवेश का कोई विकल्प नहीं है।

दुनिया अब भी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अमेरिका की बढ़त से प्रभावित है। यूरोपीय निवेशक लंबे समय से अमेरिकी टेक शेयरों के उत्साही खरीदार रहे हैं, पर पिछले वर्ष अमेरिकी शेयर बाजार में विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत दक्षिण कोरिया रहा है। यह एक ऐसा देश है, जहां अमेरिका या एआई से जुड़े एसेट्स के प्रति आकर्षण बेहद तीव्र है।

भारत में भी यह ट्रेंड दिखता है। 2025 में भारतीयों ने विदेशों में लगभग हर श्रेणी- यात्रा, शिक्षा, उपहार- पर पिछले वर्ष की तुलना में कम खर्च किया, लेकिन पोर्टफोलियो निवेश में 60 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

सरकार द्वारा निवेश की सीमाओं में ढील दिए जाने से भारतीयों के लिए विदेशी फाइनेंशियल एसेट्स को खरीदना आसान हुआ है और इन निवेशों का चौंकाने वाला 99 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका की ओर जा रहा है।

इसका भी एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) में जाता है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा सीधे अमेरिकी कंपनियों के शेयरों में निवेश होता है- विशेषकर उन बड़ी टेक कंपनियों में, जो एआई क्रांति के केंद्र में हैं।

बाजार के रुझान स्थायी नहीं होते और ‘दिन भर आलोचना, रात भर खरीदारी’ की आदत भी इससे अलग नहीं। अमेरिका में एआई शेयरों को लेकर जो उन्माद है, वह अस्तित्वगत प्रश्न खड़े कर रहा है। यह स्पष्ट नहीं है कि एआई की दौड़ में कौन-सी कंपनियां विजेता बनेंगी और यह भी निश्चित नहीं कि वे अमेरिकी ही होंगी। चीन ने दिखा दिया है कि वह प्रतिस्पर्धा कर सकता है। उसके कुछ एआई मॉडल अमेरिकी मॉडलों जैसा ही प्रदर्शन कम ट्रेनिंग-लागत पर दे रहे हैं।

इधर अमेरिकी बाजार की प्रभुत्वशाली स्थिति और उसकी अनिश्चितता के जवाब में अन्य सरकारें भी अपने जोखिमों में विविधता लाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। वे ट्रेड डील कर रही हैं, विनियमन में ढील दे रही हैं और रक्षा तथा स्थानीय प्रौद्योगिकी में निवेश बढ़ा रही हैं। पिछले वर्ष अमेरिका में पूंजी के भारी प्रवाह के बावजूद दुनिया के अन्य हिस्सों के बाजारों ने प्रदर्शन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया।

अमेरिका के बाहर ग्रोथ में तेजी आने के साथ यह रुझान और मजबूत हो रहा है। इस वर्ष और अगले वर्ष अन्य अर्थव्यवस्थाओं के अमेरिका की तुलना में डेढ़ गुना तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। 2027 तक उभरते बाजारों में औसत या समान कॉर्पोरेट मुनाफा अमेरिका की तुलना में दोगुनी गति से बढ़ने का अनुमान है, जबकि अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह वृद्धि दर लगभग 50 प्रतिशत अधिक रहने की संभावना है।

विदेशी निवेशक अमेरिका की चाहे जितनी बुराई करें, उनके पास अब 70 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी एसेट्स हैं- जो एक दशक पहले के स्तर के दोगुने हैं। जब तक यह जारी रहेगा, अमेरिकी बाजारों पर असर नहीं पड़ने वाला है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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