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जब जर्मन फुटबॉल खिलाड़ी देनीस उन्दव ने खेल के अंतिम क्षणों में दो गोल करके अपनी टीम को आइवरी कोस्ट पर 2-1 से जीत दिलाई, तो आपको ऐसे बहुत कम जर्मन प्रशंसक मिलेंगे, जो उन्हें राष्ट्रीय नायक न मानते हों। इस बात की बहुत कम परवाह की गई कि कुर्द-यजीदी माता-पिता के इस तुर्की-सीरियाई बेटे की शक्ल-सूरत पारंपरिक जर्मन नहीं थी। लेकिन उन्होंने जर्मन टीम को एक रोमांचक जीत दिलाई, जिससे साबित हुआ कि इस “खूबसूरत खेल’ को किसी भी अन्य खेल की तुलना में अधिक वैश्विक दर्शक क्यों मिलते हैं। उन्दव की सफलता अतिवादियों के मुंह पर एक तमाचा भी थी। वे और उनकी टीम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि बहुत अलग-अलग पृष्ठभूमि और रूप-रंग वाले लोग एक साझा उद्यम में पिरोए जा सकते हैं, और वे सामूहिक गर्व का स्रोत भी बन सकते हैं। वे दिखाते हैं कि अपने देश से प्रेम करना (जिसे अकसर लेफ्ट की विचारधारा में विकृत रूप में पेश किया जाता है या जिसे अनफैशनेबल माना जाता है) और नए लोगों का स्वागत करना (जिसे धुर दक्षिणपंथी नापसंद करते हैं) एक-दूसरे के विरोधी विचार नहीं हैं। और यह सिर्फ जर्मन टीम तक ही सीमित नहीं है। इस बार तीन देशों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा फीफा विश्व कप लगातार अरबों प्रशंसकों के सामने जातीय रूप से मिश्रित टीमों को पेश करता रहा है। विश्व कप का हर गंभीर दावेदार देश ऐसे खिलाड़ियों को मैदान में उतार रहा है, जिनके परिवार केवल एक या दो पीढ़ी पहले उनके यहां आए थे, और इसके बावजूद वे सभी एक प्रसन्नचित्त देशभक्ति की लहर को प्रेरित कर रहे हैं। विविधता और राष्ट्रीय गर्व का यह संयोजन ही वह चीज है, जिसे राजनीतिक चरमपंथ असंभव बताता है। औद्योगीकृत दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मुख्यधारा की राजनीति सांस्कृतिक और जातीय रूप से अलग-अलग लोगों के आगमन और इस तरह के प्रवासन से होने वाले कथित असंतोष को लेकर चिंता में डूबी रहती है। एक समय में इंटरनेट के अंधेरे कोनों तक सीमित विचार- जैसे “ग्रेट रिप्लेसमेंट सिद्धांत’ और “री-इमिग्रेशन’ की मांग अब सम्मानित मंचों पर व्यक्त किए जा रहे हैं और उन पर बातें हो रही हैं। एक हालिया सर्वेक्षण में पाया गया है कि 45% ब्रिटिश, 50% डैनिश, 51% फ्रांसीसी, 53% जर्मन, 51% इतालवी, 52% पोलिश और 46% स्पेनिश लोग एक ऐसे परिदृश्य का समर्थन करेंगे, जिसमें आप्रवासन को रोका जाए, और हाल में आए कई प्रवासी फिर से लौट जाएं।
निश्चित रूप से, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आप्रवासियों को “एथनिक क्लीन्सिंग’ जैसी किसी कठोर प्रक्रिया के चलते जबरन खदेड़ने वाली बातों को कोई बहुत समर्थन मिलेगा, लेकिन ऐसी चेतावनियों के बावजूद एक दशक पहले की तुलना में चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिलता है। एक दशक पहले इन्हीं देशों में से कई में लोगों ने मध्य-पूर्व में युद्ध से भागकर आ रहे माइग्रैंट्स का अपने यहां स्वागत किया था। इस बीच, लेफ्ट विचारधारा का एक बड़ा हिस्सा भी हर मुद्दे को उत्पीड़क और उत्पीड़ित के चश्मे से देखने की अपनी आदत के चलते एक अलग, लेकिन परेशान करने वाली दिशा में आगे बढ़ा है। इस सरलीकृत दृष्टिकोण के चलते पश्चिमी देश हमेशा खलनायक होते हैं और देशभक्ति को हमेशा संदेह या तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह बदलाव मतदान के आंकड़ों में भी परिलक्षित होता है। गैलप के अनुसार, अमेरिकी होने पर गर्व महसूस करने वाले डेमोक्रेट्स का हिस्सा 2000 के दशक की शुरुआत में 60% से अधिक से घटकर 2019 में केवल 22% रह गया था (हालांकि तब से इसमें कुछ सुधार हुआ है)। इस गिरावट का अधिकांश हिस्सा डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल के साथ घटित हुआ, जिससे यह पता चलता है कि यह सत्ता में बैठे लोगों से असंतोष को दर्शाता है। फिर भी, ट्रेंड्स स्पष्ट हैं। यह कोई रहस्य नहीं है कि राष्ट्रीय गौरव की बात वामपंथियों में से कई लोगों के लिए शर्मनाक बन गई है। यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है, क्योंकि साझा पहचान के सहारे के बिना वंचित लोगों का समर्थन करने के लिए बनाई गई नीतियों के इर्द-गिर्द राजनीति के एकजुट होने की संभावना कम हो जाती है। इसमें कॉलेज डिग्री से वंचित कामगार भी शामिल हैं, जो औद्योगिकीकृत दुनिया में कई दशकों से संघर्ष कर रहे हैं। बेशक, पेशेवर एथलेटिक्स समाज का एक आदर्श दर्पण नहीं है। कोई राष्ट्रीय टीम एक छोटा, संसाधन-संपन्न और गहराई से प्रबंधित समूह होती है, जो मैच जीतने के स्पष्ट लक्ष्य से एकजुट होती है। एक विजयी टीम बनाना, बड़ी आबादी को घर, स्कूलों और श्रम बाजारों में एकजुट करने जैसा नहीं है। और खेलों में भी एकीकरण उतना सहज नहीं रहा है। यूरो 2020 का फाइनल हारने के बाद इंग्लैंड के अश्वेत खिलाड़ियों पर नस्लवादी गाली-गलौज की बौछार कर दी गई थी; फ्रांस की राष्ट्रीय टीम को हमेशा इस बहस में घसीटा जाता है कि उसमें कौन वास्तव में फ्रांसीसी है; और अमेरिका में तो कई खेलों में नस्लवाद का एक भद्दा इतिहास रहा है। एकीकरण का जश्न कई लोग मना सकते हैं, लेकिन एल्गोरिदम के द्वारा सशक्त की गई आवाजें आज बहुत बुलंद और अनुपातहीन रूप से प्रभावशाली हो चुकी हैं। इस मायने में, खेल भी समाज में नजर आने वाले पैटर्न की ही नकल करते हैं। विश्व कप यह साबित नहीं करता कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों को एकसूत्र में पिरो देना आसान है। लेकिन यह उस बात की पुष्टि जरूर करता है, जिसे अतिवादी नकारना चाहते हैं : और वो यह है कि जातीय एकजुटता और देशभक्ति का गर्व नियमित रूप से सह-अस्तित्व में रहते हैं। अपनी बहु-जातीय टीम को राष्ट्रीय ध्वज उठाए देखने वाले अधिकांश प्रशंसक बिना किसी लाग-लपेट के इस सच्चाई का अनुभव करते हैं। अगर कट्टर दक्षिणपंथी और धुर वामपंथी अपने अहंकार को थोड़ी देर के लिए छोड़कर विश्वकप के कुछ मैच देखें, तो वे उस बात को फिर से खोज सकते हैं, जो हम पहले से जानते हैं। वो यह कि जब एकजुटता और राष्ट्रीय गर्व साथ-साथ चलते हैं, तो ज्यादातर मामलों में परिणाम जीत दिलाने वाला ही होता है!
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
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