कौशिक बसु का कॉलम:  ‘सुपर स्मार्ट’ प्रणालियों का नियंत्रण किनके हाथों में हो?
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कौशिक बसु का कॉलम: ‘सुपर स्मार्ट’ प्रणालियों का नियंत्रण किनके हाथों में हो?

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जो बौद्धिक कार्य पहले केवल इंसानों द्वारा किए जा सकते थे, अब उन्हें भी करने में सक्षम मानी जा रही आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (एजीआई) की संभावना ने उम्मीदें और चिंता, दोनों ही पैदा की हैं। दिलचस्प यह है कि एजीआई के फायदे-नुकसानों को लेकर हुए सबसे सूक्ष्म विश्लेषणों में से एक खुद ओपनएआई के सीईओ सैम आल्टमैन ने किया है। अपने एक ब्लॉग पोस्ट में आल्टमैन ने ऐसा संदेह जताया है, जो तकनीक के प्रति आशावादी लोगों में कम ही देखने को मिलता है। उन्होंने लिखा कि ‘हम चाहते हैं एजीआई मानवता को ब्रह्मांड में अधिकतम रूप से फलने-फूलने की शक्ति दे।’ लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकारा कि ऐसा करने के लिए ‘बड़े जोखिमों से निपटना’ होगा। ज्ञानोदय काल के बाद से मानवता में अंधविश्वास और रूढ़िवाद के बजाय वैज्ञानिकता का संदेहवादी भाव बढ़ा है। यह भरोसा भी बढ़ा है कि वैज्ञानिक प्रगति स्वाभाविक रूप से लाभकारी है। यह सोच कहती है कि भले परमाणु बम जैसी खोजें विनाशकारी हों, लेकिन प्रकृति की गहरी समझ देने वाला विज्ञान नि:संदेह मानव-कल्याण में भी सक्षम है। अलबत्ता इस बात को अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है कि विज्ञान में अटूट भरोसा भी अपने में एक रूढ़िवादी धारणा बन सकता है। 2024 के एक शोध-पत्र में मैंने और यॉर्गेन वेइबुल ने गेम थ्योरी का उपयोग करके इस प्रवृत्ति का अध्ययन किया था। जब इंसान ऐसी अनिश्चितता भरी परिस्थितियों में एक-दूसरे से संवाद करते हैं- जिनमें किसी व्यक्ति के लिए क्या तर्कसंगत है, वह इस पर निर्भर करता हो कि दूसरे के लिए क्या तर्कसंगत है- तो कोई नई वैज्ञानिक खोज ‘प्रिजनर्स डिलेमा’ थ्योरी जैसे हालात पैदा कर सकती है। इसमें हर व्यक्ति का निजी, तर्कसंगत व्यवहार अंततः ऐसे नतीजे लाता है, जो सभी के लिए बदतर हों। एजीआई का उदय भी ऐसी ही घटना साबित हो सकता है। और इसीलिए आल्टमैन का संदेह उचित है। वे कहते है कि एजीआई हर व्यक्ति को अविश्वसनीय क्षमताएं देने में सक्षम है, लेकिन यह गंभीर दुर्घटनाएं और सामाजिक व्यवधान भी पैदा कर सकता है। ऐसे में चुनौती यह है कि ‘नालेज कर्स’ के जोखिम को कम से कम किया जाए। चूंकि भविष्य अनिश्चित है तो सबसे बेहतर जो हम कर सकते हैं, वो यह है कि सोचे-समझे अनुमान लगाएं और रोकथाम के विवेकपूर्ण तरीके अपनाएं। इन चुनौतियों को केवल निजी क्षेत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इनसे निपटने के लिए कुछ हद तक संसाधनों का पुनर्वितरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी होगा। संभवतः एजीआई का सबसे गंभीर परिणाम श्रम की मांग में गिरावट होगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों के पास करने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। वास्तव में तो वे फुर्सत का पहले से कहीं अधिक मजा ले सकते हैं। लेकिन श्रम को यदि किताबी भाषा के तौर पर परिभाषित किया गया कि यह पारिश्रमिक के बदले किया गया कार्य है, तो फिर एजीआई की वो दुनिया श्रम को अप्रासंगिक बना सकती है, जिसमें मशीनें लगभग हर क्षेत्र में इंसानों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं। चूंकि ज्यादातर वयस्क आबादी श्रम से होने वाली आय पर निर्भर है, इसलिए ऐसा बदलाव अरबों लोगों को आजीविका से वंचित कर सकता है। इसीलिए आल्टमैन ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) की हिमायत की है, जो हर आदमी को न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी देगी। लेकिन एजीआई नौकरियों और आय पर प्रभाव से परे जाकर वैश्विक अधिनायकवाद का रास्ता भी खोल सकती है। यदि इन प्रणालियों का नियंत्रण चंद हाथों में सिमटा तो गिने-चुने अरबपति पूरी मानवता पर अभूतपूर्व ताकत हासिल कर सकते हैं। एजीआई तक सभी की पहुंच होना भी समस्या-समाधान का एक हिस्सा मात्र है। उतना ही महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना भी है कि पैसे और ताकत का अत्यधिक केंद्रीकरण न हो। यदि इन प्रणालियों का नियंत्रण चंद हाथों में सिमटा तो गिने-चुने अरबपति पूरी मानवता पर अभूतपूर्व ताकत हासिल कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि पैसे और ताकत का अत्यधिक केंद्रीकरण न हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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