डॉ. अनिल जोशी का कॉलम:  प्लास्टिक को ऐसे उपयोग करना होगा कि कचरा न बने
टिपण्णी

डॉ. अनिल जोशी का कॉलम: प्लास्टिक को ऐसे उपयोग करना होगा कि कचरा न बने

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Dr. Anil Joshi’s Column Plastic Should Be Used In Such A Way That It Does Not Become Garbage

3 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
डॉ. अनिल जोशी पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् - Dainik Bhaskar

डॉ. अनिल जोशी पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद्

इस बार के पर्यावरण दिवस (5 जून) को प्लास्टिक-मुक्ति के लिए समर्पित किया गया है। इस थीम के अनुसार प्लास्टिक के उपयोग को सीमित करने के लिए एक सामूहिक प्रयास की पहल दुनिया में होनी चाहिए। प्लास्टिक आज हमारे जीवन में इस हद तक समा गया है कि घर से लेकर बाहर तक, धरती से आसमान तक, हिमखंडों से लेकर समुद्र तक- हर जगह इसे देखा जा सकता है।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि दुर्भाग्य से प्लास्टिक हमारे लिए इतना ज्यादा उपयोगी साबित हुआ है कि हमने इसे व्यापक पैमाने पर हर क्षेत्र में अपना लिया। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा, जिसमें प्लास्टिक ने जड़ें न जमा ली हों। इतनी गहरी जड़ें कि कम समय में ही यह धरती के भीतर और बाहर सब तरफ फैल गया है।

सवाल यह है कि प्लास्टिक क्यों और कैसे आया? इसका सबसे बड़ा कारण घटते प्राकृतिक संसाधनों की चिंता थी। वनों के कटाव और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संकट को देखते हुए प्लास्टिक का आविष्कार किया गया, जिसने दुनिया में क्रांति ला दी।

कोई भी देश ऐसा नहीं बचा, जहां प्लास्टिक किसी न किसी रूप में न पहुंचा हो। अब यह न केवल धरती के भीतर और बाहर मौजूद है, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे खून में भी समा गया है। यह एक गंभीर समस्या बन चुका है, जिसे देखते हुए अमेरिका ने माइक्रोप्लास्टिक को हटाने के लिए विशेष वाटर फिल्टर तक विकसित कर लिए हैं।

माना जा रहा है कि हर व्यक्ति के शरीर में हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण प्रवेश कर चुके हैं। इसका मुख्य कारण प्लास्टिक के बर्तनों, पानी की बोतलों और कृषि में प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को माना जा सकता है। सवाल उठता है कि जब प्लास्टिक इतनी गहराई तक पहुंच चुका है, तो इससे मुक्त होना कितना संभव है?

कुछ देशों ने इसके लिए प्रतिबंध लगाए हैं। कैलिफोर्निया सहित अमेरिका के कई राज्यों में इस पर रोक के कदम उठाए गए हैं। भारत ने भी 2022 में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर कथित प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन आज भी देश के हर कोने में यह खुलकर उपयोग हो रहा है।

इस पर रोक लगाना आसान नहीं है, खासकर विकासशील देशों में, जहां गरीब तबके के लिए प्लास्टिक एक सस्ता और सुलभ साधन बन चुका है। गरीबों की झुग्गियों से लेकर उनके जूते, छतों की चादरें, खाद्य सामग्री के पैकेट तक, हर चीज में प्लास्टिक समाया हुआ है। ऐसे में इसे पूरी तरह प्रतिबंधित करना न्यायसंगत नहीं होगा।

आवश्यकता इस बात की है कि प्लास्टिक के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए सही रणनीति अपनाएं। समुद्रों, नदियों और खेतों में जो प्लास्टिक पहुंच चुका है, उसे हटाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे समाधान विकसित करने होंगे, जिनसे प्लास्टिक को पुनः उपयोग में लाया जा सके।

वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्लास्टिक को ऐसे रसायनों में बदला जाए, जो अन्य उपयोगी कार्यों में आ सकें। प्लास्टिक उद्योग को पूरी तरह समाप्त कर देना भी संभव नहीं, क्योंकि इससे आर्थिक रूप से बड़ा प्रभाव पड़ेगा।

अगर प्रतिबंध लगाने के बाद भी बाजार में प्लास्टिक उपलब्ध रहता है, तो यह समस्या का समाधान नहीं बल्कि नया व्यापार बन जाएगा, जैसा कि अन्य प्रतिबंधित वस्तुओं के साथ होता है। इसका समाधान यह है कि हम प्लास्टिक को इस तरह से पुनः उपयोग करें कि उसका कचरा न बने।

असल समस्या प्लास्टिक नहीं, बल्कि हमारा कुप्रबंधन है। सड़कों, समुद्रों और नदियों में बिखरा प्लास्टिक इस कुप्रबंधन का ही नतीजा है। यही स्थिति हमने अपने जल संसाधनों, जंगलों और हवा के साथ भी बना रखी है। हम इनके संरक्षण के बजाय केवल इनका दोहन करते आए हैं। अगर हम प्लास्टिक के साथ-साथ पर्यावरण के अन्य घटकों के प्रबंधन पर भी गंभीरता से ध्यान दें, तो समस्या सुलझ सकती है।

यह तभी संभव होगा जब हम यूज एंड थ्रो की मानसिकता से बाहर निकलेंगे और पुनः उपयोग व पुनः चक्रण (रिसाइक्लिंग) को बढ़ावा देंगे। जिस दिन हम इस सोच को अपना लेंगे, उस दिन नदियों को भी बचाया जाएगा, हवा को भी और प्लास्टिक का सही प्रबंधन भी संभव हो सकेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *