डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:  जीवन के पहले 1000 दिनों पर रहता है भविष्य का दारोमदार
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम: जीवन के पहले 1000 दिनों पर रहता है भविष्य का दारोमदार

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8 घंटे पहले

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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक - Dainik Bhaskar

डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक

विकसित भारत के बड़े सपने की नींव में एक गंभीर कमी है : बच्चे के जन्म से पहले और बचपन में देखभाल और विकास पर नाकाफी ध्यान। गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक का समय यानी जीवन के पहले 1,000 दिनों को विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ अवसरों की स्वर्णिम खिड़की मानते हैं। यही वह समय है, जो किसी भी बच्चे के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक भविष्य की दिशा तय करता है।

एपिजेनेटिक्स के क्षेत्र में हुए अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि गर्भधारण से पहले माता-पिता और गर्भावस्था में माता का स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक स्थिति, तम्बाकू का सेवन और पर्यावरणीय संपर्क बच्चे के जीन की अभिव्यक्ति और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करते हैं। माता-पिता में मोटापा, नशे की आदतें, कुपोषण और तनाव- बच्चों में गैर-संचारी रोगों, विकासात्मक देरी और मेटाबॉलिज्म संबंधी विकारों का जोखिम बढ़ा देते हैं।

इसके बाद बाल विकास की नजर से जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण चरण तीसरे वर्ष की शुरुआत से आठ वर्ष की आयु तक का होता है। इस तरह कुल मिलाकर पहले 3,000 दिन मानव विकास की दृष्टि से निर्णायक हैं। भारत में 2 से 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए कुछ योजनाएं- जैसे आंगनवाड़ी और पोषण अभियान या क्रेश हैं, लेकिन ये मुख्यतः निम्न और निम्न-मध्यम आय वर्ग तक सीमित हैं। दो वर्ष की आयु तक बच्चे के मस्तिष्क का लगभग 80-85 प्रतिशत विकास हो चुका होता है। इसलिए इस अवस्था में उपेक्षा या अभाव के दुष्परिणाम अकसर जीवन भर के लिए अपरिवर्तनीय हो जाते हैं।

इसलिए अब समय आ गया है कि हम बाल विकास के लिए गर्भधारण से लेकर दो वर्ष की आयु तक के चरण पर समन्वित, समग्र और ठोस कदम उठाएं- जहां स्वास्थ्य, पोषण, शुरुआती सीख, भावनात्मक कल्याण और देखभाल जैसे बिंदु एक साथ जुड़ें। युवाओं और दम्पतियों के लिए विवाह-पूर्व और गर्भधारण-पूर्व परामर्श पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, जिसमें पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, जीवनशैली और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा हो।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य में सबसे अधिक लाभ देने वाले निवेशों में से एक होगा, जो एक साथ दो पीढ़ियों को लाभ पहुंचाएगा। दूसरे, माता-पिता को बच्चों के विकास के बारे में जरूरी ज्ञान देने की प्रक्रिया को मजबूत किया जाए। नवजात बच्चों से जन्म के बाद से ही बातें करना, उनको कहानियां सुनाना, उनके लिए गाने गाना, उनसे खेलना और भावनात्मक जुड़ाव- ये उनके शरीर और मस्तिष्क विकास को बेहतर करते हैं। उदाहरण के तौर पर चार सप्ताह के शिशु को भी कहानी सुनाई जा सकती है। इससे मस्तिष्क में तंत्रिका संबंधों का निर्माण तेज होता है और भविष्य की सीखने की क्षमता मजबूत होती है। बच्चे के विकास के लिए अभिभावक-शिक्षा की व्यवस्था जरूरी है।

छोटे बच्चों के विकास में देरी की शुरुआती पहचान समय रहते उनकी देखभाल और सुधार का आसान तरीका है। दो से पांच वर्ष की आयु के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण देखभाल और सीखने की प्रणालियों में कहीं अधिक निवेश जरूरी है। यही वह समय है, जब कुपोषण और मोटापे की रोकथाम संभव है और जीवन भर के स्वास्थ्य तथा भावनात्मक संतुलन की आदतें आकार लेती हैं।

बच्चों को केवल स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि सीखने का अनुभव चाहिए; केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन भर के लिए पोषण की समझ चाहिए; और औपचारिक जांच नहीं, बल्कि वास्तविक स्वास्थ्य सलाह चाहिए। इसके लिए हमें स्कूलों को सीख, स्वास्थ्य और पोषण के एकीकृत केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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