![]()
हमारे आसपास की दुनिया अधिकांश लीडर्स की अपेक्षा से कहीं तेजी से बदल रही है। जो तकनीकें पांच साल पहले अस्तित्व में भी नहीं थीं, वे अब पूरी-पूरी इंडस्ट्रीज़ को नया आकार दे रही हैं। वे बिजनेस मॉडल- जिन्हें बनने में दशकों लगे- महीनों में ही लड़खड़ाते जा रहे हैं। ऐसे माहौल में किसी लीडर के पास होने वाला सबसे महत्वपूर्ण गुण अनुभव नहीं है। बल्कि यह है कि वह लगातार सीखते रहने के लिए तैयार हो। मैंने छह दशकों तक दुनिया भर के लीडर्स के साथ काम किया है। जो लीडर टिके रहते हैं, लंबे समय तक चलने वाले संगठन बनाते हैं और दशकों तक प्रासंगिक बने रहते हैं, उनमें एक आदत सबसे प्रमुख होती है। वे कभी अपनी जिज्ञासा को समाप्त नहीं होने देते। वे कभी यह नहीं मानते कि वे पहले से सब कुछ जानते हैं। क्योंकि लीडरशिप एक यात्रा है, कोई मंजिल नहीं। हाल के दिनों में युवा लीडर्स के साथ मैंने जिन सबसे महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा की है, उनमें से एक यह है कि भरपूर संसाधन होने के बावजूद कंपनियां विफल क्यों हो जाती हैं? इसका उत्तर लगभग हमेशा एक ही होता है। किसी न किसी मोड़ पर लीडरशिप ने सीखना बंद कर दिया था। उन्होंने सवाल पूछने बंद कर दिए। उन्होंने मान लिया कि जो फॉर्मूला बीते कल में काम कर रहा था, वह आने वाले कल में भी काम करेगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को ही लें। कई बड़ी कंपनियों ने तकनीकी परियोजनाओं में भारी संसाधन लगाए, लेकिन नाकाम साबित हुईं। इसके कारण शायद ही कभी टेक्नोलॉजिकल होते हैं। कारण मानवीय हैं। एडाप्टेबिलिटी का अभाव होता है। सीईओ-कमिटमेंट दिखाई नहीं देता। संगठन ने भावनात्मक और व्यावहारिक स्तर पर बदलाव को स्वीकार नहीं किया होता है। केवल टेक्नोलॉजी किसी कंपनी को बदल नहीं सकती। लीडरशिप ऐसा करती है। एलएंडटी जैसी कंपनियों की सफलता दिखाती है कि अगर लीडरशिप पूरी तरह से प्रतिबद्ध हो, अगर एडाप्टेबिलिटी संस्कृति का हिस्सा बन जाए और अगर पूरा संगठन एक साथ आगे बढ़े तो क्या-कुछ करना मुमकिन है। लीडरशिप ऊर्जा के बारे में भी है। किसी एक प्रतिभाशाली व्यक्ति की ऊर्जा नहीं, बल्कि उस ऊर्जा के बारे में, जो एक टीम के भीतर पैदा होती है। मैंने जिन बेहतरीन लीडर्स को देखा है, वे किसी कमरे पर अपना प्रभुत्व पर ही नहीं जमाते, वे उसमें ऊर्जा भर देते हैं। वे अपने आसपास के लोगों की सर्वोत्तम सोच को बाहर लाते हैं। वे ऐसा वातावरण बनाते हैं, जहां आइडियाज़ कहीं से भी सामने आ सकते हैं। यहां मैं उस सीख पर आता हूं, जिस पर अब मेरा गहरा विश्वास बन चुका है : सुनना बोलने से अधिक पावरफुल है। अधिकांश लीडर्स प्रभावित करने की कोशिश में बहुत समय लगाते हैं और समझने की कोशिश में बहुत कम। जबकि वास्तविक ताकत सुनने में है। जब आप सुनते हैं, तो सीखते हैं कि ग्राहक वास्तव में क्या चाहते हैं, कर्मचारी किस अनुभव से गुजर रहे हैं और बाजार क्या संकेत दे रहा है। लेकिन जब आप बहुत अधिक बोलते हैं, तो केवल अपनी ही आवाज सुन पाते हैं। पहले खुद समझें। फिर यह अपेक्षा रखें कि आपको समझा जाएगा। बिजनेस की दुनिया में जीवन क्षणों की एक शृंखला होता है। इनमें से कुछ क्षण छोटे होते हैं तो कुछ परिवर्तनकारी। लेकिन इन सभी में एक बात समान होती है : वे इंतजार नहीं करते। जो लीडर झिझकता है, कदम उठाने से पहले पूरी तरह से निश्चित होने का इंतजार करता है, निर्णय से पहले एक और मीटिंग पर जोर देता है, वह देर-सबेर पाएगा कि अवसर निकल चुका है। मैंने इसे बार-बार घटित होते देखा है। नोकिया के चेयरमैन ने आईफोन को आते हुए देखा था। उनके पास संसाधन थे, क्षमता थी, बाजार में मजबूत स्थिति थी। लेकिन किसी चीज ने उन्हें उस लहर पर सवार होने से रोक दिया। हर लीडर को स्वयं से केवल इतना ही नहीं पूछना चाहिए कि क्या वह अवसर को देख सकता है। बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि क्या उसने उन आदतों, सोच और साहस को विकसित किया है, जो उस अवसर पर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक हैं। यही वह चीज है, जो महान लीडर्स को अच्छे लीडर्स से अलग करती है।
जो आपको ऊर्जा देता है, उसे पहचानें और अनुशासन के साथ उसका पीछा करें। बोलने से अधिक सुनें। ऐसे सवाल पूछें जिन्हें पूछने से दूसरे लोग डरते हैं। और जब अवसर सामने आए, तो अनुमति का इंतजार न करें। आगे बढ़ें। दुनिया उन लीडर्स की है, जो कभी सीखना बंद नहीं करते। जो आपको ऊर्जा देता है, उसे पहचानें और अनुशासन के साथ उसका पीछा करें। बोलने से अधिक सुनें। ऐसे सवाल पूछें जिन्हें पूछने से दूसरे लोग डरते हैं। और जब अवसर सामने आए, तो अनुमति का इंतजार न करें। आगे बढ़ें!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link








