8 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
अगर हम पिछले साल और इस साल के बीच उस परिघटना को ढूंढने की कोशिश करें, जिसका 2026 और आने वाले वर्षों में और भी प्रभावपूर्ण हस्तक्षेप होने जा रहा है तो वह एआई है। इस हस्तक्षेप का साक्षात्कार तो घर ही में हो जाता हैं। बोर्ड, नीट, जेईई या किसी अन्य परीक्षा की तैयारी करता छात्र अब कोई ओढ़ा हुआ मौन नहीं पालता, बल्कि एआई से दिनभर बातें करता रहता है।
उसके शिक्षक या परिवार के सदस्य उसके प्रश्नों का उत्तर देने में समय लगा सकते हैं, यहां तक कि खीझ भी सकते हैं, पर एआई तनिक भी नहीं झुंझलाता। वह अभिवादन का जवाब अभिवादन से देता है। उसके माध्यम से ‘मेटावर्स’ की वर्चुअल दुनिया वास्तविक नजर आती है। वह नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि यूजर्स के लिए कुछ भी ढूंढ लाने के लिए सेवाभाव से तैयार रहता है।
ऐसे में युवाल हरारी को इस बात की चिंता होती है कि क्या हम होमो सेपियंस या बुद्धिमान शृंखला की अंतिम पीढ़ी हैं? अगर पढ़ना-लिखना, सोचना-समझना, प्रश्न करना-उत्तर तलाशना, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, बाजार आदि क्षेत्रों में आने वाले वर्षों में सारे कार्य एआई ही करेगा तो हमारी क्या उपयोगिता रह जाएगी? कहीं हम अपनी ही पृथ्वी पर सेकंड सिटीजन तो नहीं बन जाएंगे?
जिस तरह से एआई सूचना की शक्ति का केंद्र बन बैठा है और हमें धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से भी अपनी दुनिया में समेट रहा है, तो चिंता तो होनी ही चाहिए। एआई की दुनिया के विशेषज्ञ भी इसके खतरे को समझ रहे हैं और ‘रिस्पॉन्सिबल एआई’ पर गहन चर्चा शुरू हो चुकी है। ऐसे में भारत में भी एआई दक्षता को शैक्षणिक और आर्थिक विकास का अहम हिस्सा बनाने के साथ-साथ रेगुलेशन मानकों की भी तैयारी करनी होगी।
इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट- जो फरवरी में होने जा रहा है- के केंद्र में रिस्पॉन्सिबल एआई पर विमर्श भी है। ऐसे में एआई पर हमारी बढ़ती निर्भरता और उसका हमारे मन-मस्तिष्क पर बढ़ता नियंत्रण यह प्रश्न कर रहा है कि किया क्या जाए? एआई तो अब सूचना के साथ भाव भी प्रदर्शित करने लगा है।
वह अपने यूजर्स को भावुक भी कर सकता है। हमने तो सोचा था कि एआई सिर्फ एक साधन बनेगा, लेकिन अब तो मानो सबकुछ एआई ही करना चाहता है। दुनिया के तमाम देश एआई के चलते आर्थिक असमानता, नौकरी छूटने का भय, प्राइवेसी में दखल, गवर्नेंस और रेगुलेशन को लेकर चिंता जता रहे हैं।
हाल ही में चीन ने इंसानों जैसे एआई के लिए ड्राफ्ट नियम भी जारी कर दिए हैं। चीन के साइबर रेगुलेटर ने उन तमाम सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए ये नियम जारी किए हैं, जो उस मानवीय भाव और इंसानी व्यवहार की नकल करने और यूजर्स के साथ भावनात्मक बातचीत करने के लिए डिजाइन की गई एआई सेवाओं पर निगरानी को सख्त करेंगे।
इस ड्राफ्ट में एक रेगुलेटरी तरीका यह भी बताया गया है, जिसके तहत प्रोवाइडर्स को यूजर्स को ज्यादा इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देनी होगी और यूजर्स में लत के संकेत दिखें तो दखल भी देना होगा। उन एआई प्रोवाइडर्स को यूजर्स की मानसिक और भावनात्मक स्थिति की पहचान करनी होगी। अगर यूजर्स में भावनात्मक अस्थिरता पाई जाती है तो प्रोवाइडर्स को दखल देने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए।
एआई को रेगुलेट करना आज सबसे महत्वपूर्ण हो चला है। ग्रोक को लेकर भारत सरकार सख्त होती दिख भी रही है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि आखिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कुल-मिलाकर है तो एक मशीन ही, जो डेटा से संचालित होती है। उसमें मानवीय भाव और बोध तो है नहीं। बुद्धिमान होना, भावुक होना इंसानी गुण हैं। तो हम एआई को मनुष्यों की जगह क्यों लेने दें? (ये लेखक के अपने विचार हैं)








