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- Nanditesh Nilay Column | NEET Exam Failure And Student Mental Health
4 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
नीट परीक्षा का परिणाम आ चुका है। जो जीत गए उन्हें बधाई मिली है। पर जो चूक गए, उनका क्या? और जो इस परीक्षा की तैयारी करते हुए अपने जीवन से ही छूट गए, वे? क्या आप भी उन सभी को याद कर रहे हैं? क्योंकि जो हारते हैं- परीक्षा में या जीवन की परीक्षा में- उनकी कोई रैंकिंग नहीं होती।
वर्टिकल ऊंचाई सिर्फ जीत के हिस्से आती है। जो छूट गए, उनकी गलती इतनी ही थी कि वे समझ नहीं पाए कि परीक्षाएं अपने साथ सिर्फ विषय का पाठ्यक्रम लेकर नहीं आतीं। वे आती हैं उन तमाम अनिश्चिताओं के साथ, जो किसी छात्र के आत्मविश्वास को आसानी से हर लेती हैं। इसलिए क्या जीत की गूंज में हमें पहले वो याद आते हैं, जो किसी भी कारण से सफल नहीं हो पाए?
कुछ भी हो, लेकिन एक समाज को सिर्फ सफलता की ओर ही तो नहीं देखना चाहिए। हां, यह सच है कि सफलता की दिशा होती है और एक मंजिल भी, जबकि असफलता के हिस्से न दिशा आती है और न कोई मंजिल।
लेकिन क्या हमें उनके लिए नहीं सोचना चाहिए जो अपनी उलझनों, परीक्षा के दबाव और पेपर-लीक के आघात से अपनी सांसें छोड़ गए? जीत की तो स्वतः ब्रांडिंग हो जाती है, लेकिन उनके संघर्ष का क्या जो संख्याओं के खेल में कुछेक प्रतिशत से रह गए होंगे!
परीक्षा के परिणाम हमेशा की तरह उनको ढूंढते हैं, जो सफल हो जाते हैं। और हो भी क्यों नहीं। इतना आसान नहीं होता नीट या जेईई की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करना। लेकिन यह भी जरूरी है कि समय सभी की ओर वह संवेदनशील निगाह करे। क्योंकि जब नतीजे मनमुताबिक नहीं आते, तो मानो जीवन ही कुछ बेमतलब-सा लगने लगता है।
लगता है जैसे किस्मत ही मेहरबान नहीं रही, और इंसान खुद की काबिलियत पर संदेह करने लगता है। उसकी वह वर्षों की कड़ी मेहनत और रंगी कॉपियां बेकार लगने लगती हैं। उस पल में जिंदगी का हर मकसद बेमानी हो जाता है। नाकामी का असर घातक होता है।
भले ही रैंक नहीं आई हो, नाकामियों से बहुत सीख मिलती है। लेकिन भला जीतने के युग में कोई हार से क्या सीखे? और समाज भी अपने पूर्वग्रहों के साथ जीतने वाले व्यक्ति को ही सलाम करता है। ऐसे में आप भी हमारे साथ उनके बारे में सोचिए, जो इस बार इस परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाए।
हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां ‘फिनिशिंग लाइन’ लगातार आगे बढ़ती रहती है और जोर-जोर से आवाज लगाती है, ‘और तेज दौड़िए, और तेज… बस भागते रहिए।’ कुछ लोग थोड़े-से अंकों के फर्क से उस लाइन को पार कर लेते हैं, जबकि दूसरे उन्हीं अंकों के गणित में उलझकर खो जाते हैं।
और फिर जोश, सपने, अनुशासन, माता-पिता को गर्व महसूस कराने की चाहत, जीतने की भूख, किसी को कुछ साबित करने की इच्छा, सब कुछ पल भर में समाप्त हो जाता है, और जिंदगी मानो कुछ लंबे समय तक के लिए ठहर सी जाती है।
लेकिन इससे एक सवाल भी उठता है : क्या जिंदगी सिर्फ किसी परीक्षा के दायरे में ही घूमती है, और क्या किसी इंसान की अहमियत या उसकी असलियत सिर्फ नतीजों से तय होती है? फिर कांट के दर्शन का क्या होगा? क्योंकि वे मानते रहे कि किसी कार्य का मूल्यांकन सिर्फ परिणाम से नहीं, बल्कि उसके मोरल इंटेंट से भी होना चाहिए।
इस आकलन का फायदा यह होता है कि जीत के शोरगुल में बीच हार का मौन उतना भारी नहीं पड़ता। क्योंकि घर में, उनके आसपास कोई न कोई कहता रहता है कि उस विद्यार्थी ने बहुत मेहनत की है और सफलता तो मिलकर रहेगी। उस ईमानदारी से की गई मेहनत को कोई महसूस करने वाला होता है।
जो उत्तीर्ण नहीं हो पाते, उनके साथ भी समाज को खड़ा रहना चाहिए। अगर समाज समावेशी-भाव को बढ़ावा देगा तो सांसें कम छूटेंगी, हौसला कम टूटेगा और कभी न हारने वाला भाव समाज का हिस्सा बना रहेगा।
और हम सभी उत्तीर्ण विद्यार्थियों के संघर्ष को तो सुनेंगे ही, उनको भी सुनेंगे जो असफल होने के बावजूद शायद कुछ कहना चाहते हों। यह पाठक और लेखक के बीच के उस अनमोल रिश्ते की हिफाजत के लिए दिल से निकली एक आवाज है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









