टिपण्णी

नीरजा चौधरी का कॉलम: एकजुटता के बिना टिक नहीं सकते आंदोलन

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Nirja Chaudhary Column | Protest Politics Rahul Gandhi Movement Strategy

6 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार

त्योहारों के मौसम में विरोध-प्रदर्शनों को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। इनका अंतिम नतीजा चाहे जो हो, इन्होंने सतह के नीचे सुलग रहे असंतोष को सामने लाने का काम अवश्य किया है। असंतोष का दायरा कितना व्यापक है हम नहीं जानते, लेकिन हाल के हफ्तों में हुए विरोध-प्रदर्शन इस ओर इशारा करते हैं कि भारत के युवाओं में अपने भविष्य को लेकर चिंता व असुरक्षा है। अलबत्ता अभी यह कयास लगाना जल्दबाजी होगी कि इनका चुनावी असर कितना होगा।

हाल के घटनाक्रमों ने कांग्रेस और विपक्ष को नई संजीवनी अवश्य दी है। राहुल गांधी के “छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों को युवाओं के बीच अधिक स्वीकार्यता मिलने लगी है। राहुल ने इस नए अवसर का इस्तेमाल कांग्रेस को इन आंदोलनों की नेतृत्वकर्ता-पार्टी के रूप में पेश करने के लिए किया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को “शिव जी की बारात’ बताते हुए सबको शामिल होने का न्योता तक दे दिया। अब सबकी निगाहें अक्टूबर के अंत में रामलीला मैदान में होने जा रही कांग्रेस की सभा पर हैं।

सरकार भी अपनी जवाबी रणनीति के साथ मैदान में उतर चुकी है। इसमें जेन-जी को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन की अनुमति न देना, उन्हें रोकने के लिए बैरिकेड लगाना और हिरासत में लेना शामिल है। सीजेपी के सौरव दास और आशुतोष रांका न्यायिक हिरासत में हैं। उनके मामले क्राइम ब्रांच को सौंपे गए हैं।

पिछले कुछ हफ्तों में एक बात स्पष्ट रूप से सामने आई है- प्रदर्शनकारियों के लिए जरूरी है कि वे अपने घोषित उद्देश्यों और उन्हें हासिल करने की रणनीतियों- दोनों में एकजुट होकर आगे बढ़ें। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) से एसआईआर प्रक्रिया को लेकर इस्तीफा मांगने के लिए अलग-अलग समूहों को साथ आने का न्योता देने वाली “शिव जी की बारात’ अलग-अलग दिशाओं में खिंचने का जोखिम नहीं उठा सकती।

सामान्य परिस्थितियों में, आईसा प्रमुख नेहा बोरा बांग्लादेश के उन छात्रों के प्रति अपनी प्रशंसा व्यक्त कर सकती थीं, जिन्होंने ढाका में शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका था। लेकिन आज जब नेहा बोरा ऐसा बयान देती हैं, तो उसके मायने अलग हो जाते हैं, क्योंकि अब वे आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा बन चुकी हैं। उन्हें उस विशाल जुलूस का नेतृत्व करते हुए देखा गया था, जो सर्वोच्च न्यायालय तक गया था।

उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, “रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन को लेकर आंदोलन से जुड़े सभी पक्षों के साथ चर्चा नहीं हुई थी। इससे सवाल उठता है कि आंदोलन के फैसले कौन लेता है और वे किस प्रक्रिया से लिए जाते हैं?

जैसी कि अपेक्षा थी, भाजपा को प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए एक ‘मुद्दा’ मिल गया है कि वे अराजकता के जरिये सरकार बदलना चाहते हैं। अब पूरी बहस ‘सत्ता परिवर्तन’ पर सिमट गई है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी विजयादशमी के अपने संबोधन में इसके खिलाफ रुख अपनाया है, हालांकि शुरुआत में वे जेन-जी के विरोध-प्रदर्शनों को लेकर नरम थे।

कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी प्रक्रिया के जरिये चाहती है। इससे पहले, जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग की थी, तब सीजेपी के अभिजीत दीपके ने साफ कर दिया था कि उनका आंदोलन केवल सीईसी के इस्तीफे के लिए है, न कि सत्ता परिवर्तन के लिए।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद, सीजेपी ने कुछ समय तक ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद वे 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जाने के बाद उनकी विश्वसनीयता बहाल करने के मुद्दे पर आगे बढ़े।

लेकिन विपक्ष की तमाम ताकतों की एकजुटता ही उनकी प्रभावशीलता की कुंजी होगी- खासकर जब भाजपा प्रदर्शनकारियों की चुनौती का सामना करने के लिए अपने जवाबी हमलों की तैयारी पहले से कहीं अधिक मुस्तैदी से कर रही है।

यह देखना बाकी है कि सीजेपी भी “आप’ पार्टी की राह पर चलते हुए खुद को एक राजनीतिक दल में बदल लेती है या नहीं। या वह केवल एक दबाव समूह बनकर रहती है, जो सरकार को अहम मुद्दों पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर करे। नीट के पेपर लीक मामले में उसने ऐसा ही किया था।

उसके आंदोलन के चलते शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन अफसोस की बात थी कि सीजेपी ने आगे चलकर नीट और परीक्षा सुधारों के मुद्दे को छोड़ दिया। किसी राष्ट्र के जीवन में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जब ऐसे सार्थक बदलाव लाए जा सकते हों, जिनका लाभ आने वाली पीढ़ियों को मिले।

सच्चाई यह है कि सीजेपी को उन आंदोलनों के केंद्र में बने रहना चाहिए था, जिसकी शुरुआत उसने की थी। क्योंकि लोगों ने उसके नए चेहरों और उनसे आई नई ऊर्जा के प्रति ही अपना समर्थन जताया था। जहां तक विपक्षी दलों, और खासकर कांग्रेस का सवाल है, तो उन्हें सीजेपी से आगे निकलने की कोशिश करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि सत्तारूढ़ व्यवस्था के खिलाफ सीजेपी जिस माहौल का निर्माण कर रही है, उसकी स्वाभाविक लाभार्थी कांग्रेस ही होगी।

अलग-अलग दिशाओं में… प्रदर्शनकारियों के लिए जरूरी है कि वे अपने घोषित उद्देश्यों और उन्हें हासिल करने की रणनीतियों- दोनों में एकजुट होकर आगे बढ़ें। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) से एसआईआर प्रक्रिया को लेकर इस्तीफा मांगने के लिए अलग- अलग समूहों को साथ आने का न्योता देने वाले प्रदर्शनकारी अलग-अलग दिशाओं में खिंचने का जोखिम नहीं उठा सकते। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *