टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: बाहर की दुनिया में गतिमान होकर भी शांत रहने का प्रयोग

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तन कोमल हो तो फूलों से भी जख्मी होगा। मन मजबूत हो तो चट्टानें भी टूट जाएंगी। अब मन पर काम करने का समय आ गया है। लोग अलग-अलग तरीके से परेशान हैं। और एक परेशानी यह है कि मन पर काम करने के लिए भी उनके पास समय नहीं है। टेक्नोलॉजी से समय बचाया जा रहा है और फिर भी लोगों के पास अपने लिए समय नहीं बच रहा। हमारे यहां एक शब्द और एक चिह्न मन की शांति के लिए बड़े उपयोगी हैं। इन दोनों का प्रयोग सिर्फ भारतीय संस्कृति ने किया है और अद्भुत किया है। एकांत में ‘ओम’ शब्द का उच्चारण और ‘स्वस्तिक’ चिह्न को दोनों भौहों के बीच में आज्ञा चक्र पर देखा जाए। यह शब्द-चिह्न ऋग्वेद में व्यक्त हुए हैं। योग-क्षेम के युगल हैं यह दोनों। जब कभी आपको एकांत में अपने पर काम करना हो तो कमर सीधी रखें, आंखें बंद, दोनों भौहों के बीच में भीतर से आज्ञा चक्र पर देखें। ओम का उच्चारण करें और उस ओम को क्लॉकवाइज स्वस्तिक के चिन्ह पर भीतर ही भीतर घुमाएं। नतीजा यह होगा कि बाहर की दुनिया में आप खूब गतिमान रहेंगे, लेकिन भीतर शांति उतरेगी।



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