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- Neerja Chowdhury’s Column: What Is The Reason Behind Mamata’s “Royal Stubbornness”?
6 घंटे पहले
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नीरजा चौधरी वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार
ममता बनर्जी ने एक बार फिर अप्रत्याशित कदम उठाया है। बंगाल की पराजित मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि वे इस्तीफा नहीं देंगी। उनका आरोप है कि चुनाव में वोटों की लूट हुई और मतदाता-सूचियों से उनके समर्थकों के नामों को हटाया गया। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका यह कथन है कि वे इंडिया गठबंधन के लिए काम करेंगी।
जबकि अतीत में इस गठबंधन से उनका संबंध डावांडोल रहा है। किसी लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता की हार का क्षण हमेशा ही बहुत आवेगपूर्ण होता है। 1977 में जब आम चुनाव के नतीजे आ रहे थे, तो निराश इंदिरा गांधी ने अपनी मित्र पुपुल जयकर से कहा था- “पुपुल, मैं हार गई।’ दोनों महिलाएं साथ-साथ चुपचाप बैठी रहीं। कुछ ही मिनटों में उस समय की दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक अचानक असुरक्षित हो गई थीं।
बाहर बज रहे ढोल-नगाड़े अब उनकी प्रशंसा नहीं कर रहे थे, बल्कि उनकी विदाई का जश्न मना रहे थे। जबकि 1977 के ये चुनाव स्वयं इंदिरा ने ही तब आयोजित करवाए थे, जब देश में अभी आपातकाल लागू था। उत्तर भारत में उनकी पार्टी का सफाया हो गया, यहां तक कि वे अपनी सीट भी हार गईं।
स्थापित परम्परा के अनुसार, इंदिरा ने इस्तीफे की घोषणा की और फिर तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रपति बसप्पा दानप्पा जट्टी को त्यागपत्र सौंपने पहुंचीं। हालांकि उन्होंने उनसे वैकल्पिक व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने का अनुरोध किया।
पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने एक बार कहा था कि भारत के लोकतंत्र की असाधारण दृढ़ता का एक कारण यह भी है कि चुनावों के बाद वह एक सरकार से दूसरी में शांतिपूर्ण और बिना हिंसा या प्रतिरोध के सुचारु संक्रमण कर पाता है। गुजराल 1996 की ओर संकेत कर रहे थे। तब नरसिंहराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस आम चुनाव हार गई थी और वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी थी।
लेकिन वह भी मात्र 13 दिनों में गिर गई, क्योंकि वे बहुमत जुटाने में असफल रहे थे। इसके बाद देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। संसद में नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिले और सत्ता के गलियारों में परदे के पीछे की गतिविधियां चलती रहीं। लेकिन इन सबके बावजूद, सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्वक और सुचारु रूप से ही हुआ।
लेकिन यह पहली बार है जब किसी मुख्यमंत्री ने चुनाव हारने के बाद पद छोड़ने से इनकार किया है। इससे एक पेचीदा स्थिति उत्पन्न हो गई है। बंगाल विधानसभा का कार्यकाल आज समाप्त हो रहा है। इसी दिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा और विधिक एवं संवैधानिक विशेषज्ञों की राय है कि उन्हें पद छोड़ना होगा।
यदि वे ऐसा नहीं करतीं, तो राज्यपाल उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं और विजयी दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। इंदिरा गांधी के विपरीत- जिन्होंने तत्काल इस्तीफे की घोषणा की थी और फिर जनता सरकार के खिलाफ वापसी की लड़ाई लड़ने में जुट गई थीं- ममता ने तुरंत आक्रामक रुख अपनाने का विकल्प चुना है।
ऐसा नहीं है कि एसआईआर प्रक्रिया के संचालन के तरीके पर उनकी आपत्ति पूरी तरह निराधार है। जल्दबाजी में इसे अंजाम दिया गया और इसके कारण लगभग 27 लाख मतदाता वोट नहीं डाल सके, क्योंकि उनके मामलों का निपटारा नहीं हो पाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनसे कहा कि वे अगली बार मतदान कर सकते हैं।
जाहिर है कि इस पूरी प्रक्रिया को और बेहतर ढंग से हैंडल किया जा सकता था। लेकिन यह तो समय ही बताएगा कि इस्तीफा न देकर ममता ने दूरदर्शिता दिखाई है या नहीं। यह ऐसा कदम है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह एक अनावश्यक मिसाल कायम करता है, क्योंकि इसके बाद भविष्य में और मुख्यमंत्री (और सम्भवतः प्रधानमंत्री भी) आसानी से अपने उत्तराधिकारी के लिए रास्ता छोड़ने से इनकार कर सकते हैं।
भारत जैसे विशाल देश में चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर प्रश्न लगातार उठते रहते हैं और लगभग हर चुनाव में वोट चोरी के आरोप किसी न किसी रूप में सामने आते रहे हैं। लेकिन इसके विरोध में अन्य उपाय भी उपलब्ध हैं- जैसे चुनाव याचिका दायर करना या जनमत तैयार करना।
हालांकि चुनाव याचिकाएं- अदालतों में लगने वाले लंबे समय के कारण- अब तक बहुत प्रभावी उपाय साबित नहीं हुई हैं। 1971 में राज नारायण ने तब इंदिरा गांधी की जीत को चुनौती दी थी, जब वे अपने उत्कर्ष पर थीं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने उन्हें चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया था और इसके जवाब में इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई थी।
महत्वपूर्ण यह है कि 1971 से 1975 तक फैसला आने में चार वर्ष लग गए थे। आज विभिन्न संस्थाओं के बीच का संतुलन पहले ही भारी दबाव में है। देश में बढ़ती और तीखी होती ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति- जो पश्चिम बंगाल चुनावों के दौरान एक बार फिर सामने आई- इस पर और अधिक तनाव डालने वाली है। ममता भली-भांति जानती हैं कि वे मुख्यमंत्री नहीं बनी रह सकतीं।
लेकिन उन्होंने स्पष्टतः राजनीतिक कारणों से यह कदम उठाया है। वे पार्टी कैडर का मनोबल बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, जो ऐसी हार के बाद स्वाभाविक रूप से गिर सकता है। कैडर-राज ही टीएमसी की रीढ़ है। 2011 में जब वे सत्ता में आईं, तब से यह एक समानांतर व्यवस्था की तरह काम कर रहा है। लेकिन इस बार भाजपा ने इस ढांचे में सेंध लगा दी है।
ऐसे में ममता अपने समर्थकों को संदेश दे रही हैं कि वे इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं और वापसी करेंगी। बंगाल के जनादेश को स्वीकार न करके, वे स्वयं को भविष्य की राजनीतिक लड़ाइयों के लिए पुनः स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। यदि ममता चौथी बार भी जीत जातीं तो वे इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की स्वाभाविक दावेदार होतीं।
लेकिन पराजय में भी वे खुद को एक प्रमुख भूमिका में दिखना चाहती हैं- एक हारी हुई नेता के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी पीड़िता के रूप में जिनके साथ अन्याय हुआ है। हालांकि कांग्रेस ने केरल में जीत हासिल की है, लेकिन उसे पता है कि 2027-28 में होने वाले चुनावों में उसके सामने बड़ी चुनौतियां हैं। राहुल गांधी ने जिस तरह से अंतिम क्षणों में ममता बनर्जी का समर्थन करने की अपील की, उसे भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
स्पष्टत: राजनीतिक कारणों से उठाया गया कदम… ममता जानती हैं कि वे मुख्यमंत्री नहीं बनी रह सकतीं। लेकिन उन्होंने स्पष्टतः राजनीतिक कारणों से यह कदम उठाया है। वे पार्टी कैडर का मनोबल बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, जो ऐसी हार के बाद स्वाभाविक रूप से गिर सकता है। कैडर ही टीएमसी की रीढ़ है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)









