एन. रघुरामन का कॉलम:  भविष्य में आपका मकान ही आपकी दुकान बन सकता है
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एन. रघुरामन का कॉलम: भविष्य में आपका मकान ही आपकी दुकान बन सकता है

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4 घंटे पहले

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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

मै क्सिकन ईटरी चलाने वाले रेमे जिमेनेज दो साल पहले पिता और दो भाई-बहनों के गुजरने के बाद लॉस एंजेलिस आ गए। मां को सहारे की जरूरत थी तो रेमे ने सोचा कि उनके साथ एक कैफे शुरू करें। लेकिन बढ़ते खर्च और अनगिनत डाइनिंग परमिट्स की औपचारिकता ने अमेरिका में कारोबार शुरू करना असंभव बना दिया। उन्होंने फुटपाथ पर स्नैक्स बेचना शुरू किया, लेकिन अंतत: स्थानीय नगर निकाय ने उसे भी बंद करा दिया। यह 2024 की बात है।

हालांकि, उसी साल एक नए क्षेत्रीय कानून में घर से चलने वाली रसोइयों को अधिकृत कर दिया गया। इस पहल की कुछ सीमाएं हैं। कंपनी रोजाना 30 प्लेट से ज्यादा नहीं बेच सकती। सालाना कमाई एक लाख डॉलर से ज्यादा नहीं हो सकती, जो वहां एक नए टेक वर्कर को गुजारे के लिए मिलने वाली ठीक-ठाक कमाई है। लाइसेंस की कीमत 597 डॉलर रखी गई, लेकिन लोगों को इस कॉन्सेप्ट के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए शुरुआती सैकड़ों लोगों के लिए इसे माफ किया गया।

शुरुआत में लोग घर से किचन शुरू करने में हिचकिचाए। लेकिन रेमे जैसे लोगों ने मौका भुनाया और जल्द ही 320 लाइसेंस जारी हो गए। अभी शहरी प्रशासन के पास इतनी पूंजी है कि वह 470 और ऐसे व्यवसायों को सहायता दे सके। 30 जून तक कोई भी घर से खान-पान कारोबार शुरू करने के लिए कोई शुल्क नहीं देगा। लाइसेंस के लिए दो फूड वर्कर सर्टिफिकेट, कुछ सफाई जांचें और एक मूल्यांकन जरूरी है।

लेकिन यह देश में कहीं भी डाइनिंग प्रतिष्ठान खोलने के लिए जरूरी राज्य और स्थानीय स्तर के परमिटों के ढेर से बहुत कम है। अब यह एक व्यक्ति या कुछ सौ घरों की कहानी नहीं है। घर से चलने वाली रसोई भले ही अमेरिका में नया चलन हो, लेकिन मैक्सिको, भारत और कई दक्षिण एशियाई देशों में यह प्रचलित है।

चूंकि वहां रोजगार के मौके कम हैं तो वे इस विचार को बढ़ावा देते हैं। दुनिया भर के कई शहरी स्थानीय प्रशासन आज यही रणनीति विकसित कर रहे हैं। जब नई नौकरियां सृजित नहीं हो पातीं तो वे स्वरोजगार को बढ़ावा देते हैं, जैसे ओला-उबर जैसे एप्स को मंजूरी देना। कैटरिंग कारोबार में भी वे उन लोगों को साथ लेकर यही कर रहे हैं, जिनके पास कुछ कमरे हैं, अच्छा खाना बनाने का हुनर है और जो लोगों को रियायती दामों पर खाना दे सकते हैं।

इससे दो लक्ष्य पूरे होते हैं- समुदाय में भूखे लोगों को बेहतर और सस्ता खाना मिलता है। साथ ही आबादी का एक हिस्सा व्यस्त और उपयोगी बना रहता है, जिससे वह स्थानीय प्रशासन के विरोध में नहीं उतरता।

ऐसा नहीं है कि दूसरे देशों में लोग ऐसा नहीं कर रहे। हमारे यहां भी कई घरों में बिना परमिट के किचन हैं। पूरा प्रोजेक्ट परिवार से प्रबंधित होता है। न सड़कों पर खाने की गाड़ियों का ट्रैफिक, न खाने के बाद इलाके में गंदगी होती है। ‘पीछे मकान, आगे दुकान’ का तरीका जानने और फॉलो करने वाले हम लोगों के लिए यह कारोबार नया नहीं है। धीरे-धीरे अमीर लोगों ने इसे ‘ऊपर मकान, नीचे दुकान’ में बदला।

लेकिन भविष्य में यह बदलने वाला है, जब ‘आपका मकान ही आपकी दुकान’ होगी। ऐसा गांवों में ही नहीं, अमीर देशों के भीड़भाड़ वाले महानगरों में भी होगा, क्योंकि छोटे कारोबारों को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। बदलते वैश्विक हालात से हमें सीखना चाहिए कि अगर आपके पास थोड़ी भी जगह है, जैसे कोई कार गैराज, तो यही छोटा-सा हिस्सा भविष्य के व्यापार में आपकी सबसे बड़ी संपत्ति बन सकता है।

फंडा यह है कि किसी भी री-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए अपनी छोटी-सी जगह भी मत बेचिए, क्योंकि नए एआई-जगत में भावी पीढ़ी के लिए अच्छी नौकरी पाना मुश्किल होगा। ऐसे में उनका मकान ही उनकी भविष्य की दुकान बन सकता है।

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