पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  ठीक से पर्वतों को देख लें तो माया, मोह, शोक चला जाता है
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: ठीक से पर्वतों को देख लें तो माया, मोह, शोक चला जाता है

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  • Pt. Vijayshankar Mehta’s Column If You Look At The Mountains Properly, Illusion, Attachment And Sorrow Go Away.

48 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

पहले पर्वतों के भी पंख हुआ करते थे। उनकी उड़ान देखकर हर कहीं उनका टिकना इंद्र को पसंद नहीं आया। इंद्र ने पंख काट दिए और पहाड़ एक जगह स्थिर हो गए। पहाड़ों को अगर ध्यान से सुना जाए तो वो कहते हैं कि हमारी स्थिरता ही हमारी यात्रा है।

मनुष्य के जीवन में पहाड़ बहुत बड़ा संदेश देते हैं। जैसे नदियां भी बहुत कुछ समझाती हैं। योगी लोग एक प्रयोग बताते हैं। सुबह उठने के बाद आंख बंद करके किसी नदी, विशेषकर गंगा का स्मरण करें। और रात को सोने के पहले किसी पहाड़- वो हिमालय भी हो सकता है- उसका स्मरण करें।

शंकर जी के कहने पर पक्षीराज गरुड़ काकभुशुण्डि जी के पास पहुंचे तो वहां उन्हें एक पर्वत दिखा। तुलसी लिखते हैं- देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ, माया मोह सोच सब गयऊ। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और सब माया, मोह और सोच जाता रहा। अगर ठीक से पर्वतों को देख लिया जाए तो माया यानी इल्यूजन, मोह यानी फैसिनेशन, सोच (शोक) यानी ग्रीफ चला जाता है। पाषाण में भी प्राण हैं!

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