पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  भक्ति के जल से अपने अंत:करण को धोते रहिए
टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: भक्ति के जल से अपने अंत:करण को धोते रहिए

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Pt. Vijayshankar Mehta’s Column Keep Washing Your Conscience With The Water Of Devotion

20 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक
पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

दो तरह के जल हैं। दुनियादारी का जल और भक्ति का जल। श्रीराम से बात करते हुए गुरु वशिष्ठ ने कहा था- ‘छूटइ मल कि मलहि के धोएं, घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएं। प्रेम भगति जल बिनु रघुराई, अभिअंतर मल कबहुं न जाई।’ यानी मैल से धोने से क्या मैल छूटता है? जल को मथने से क्या घी मिलता है? उसी प्रकार हे राम, प्रेम भक्ति रूपी निर्मल जल बिना अंत:करण का मल नहीं जाता।

हमारे मन में प्रतिपल दुर्गुणों की धूल, गंदगी जमती रहती है और हम सफाई भी उसी से करते हैं। हम जितनी भक्ति करेंगे, उतने आंतरिक रूप से शुद्ध होते जाएंगे। ईश्वर निजी पवित्रता पर आकर्षित होता है। हम भीतर से क्या हैं, अकेले में क्या-क्या करते हैं, ये हम और हमारे भगवान ही जानते हैं।

सब के सामने तो संस्कारित, सभ्य, भद्र, शीलवान सभी नजारा लेते हैं। लेकिन आप भीतर से क्या हैं, अकेले में क्या हैं, ये ईश्वर जानता है। इसलिए भक्ति के जल से अपने अंत:करण को धोते रहना चाहिए। यही बात वशिष्ठ जी ने हमें समझाई है।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *