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- Pt. Vijayshankar Mehta’s Column God Is Extra Generous Towards Daughters
23 मिनट पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
बेटे-बेटी के लालन-पालन में सावधानी के स्तर पर जरूर फर्क रखिए, लेकिन लाड़-प्यार में अंतर नहीं होना चाहिए। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ- इसमें पढ़ाना शब्द बड़ा गहरा है। पुरुष की शिक्षा स्त्री की शिक्षा से तब भी अलग थी और आज भी अलग है।
व्यावसायिक जीवन में एक जैसे शिक्षित व्यक्ति के लिए संघर्ष बदल जाता है। परिवार की बात करें तो एक आंकड़ा बहुत सुखद इन दिनों नजर आता है कि पढ़ी-लिखी बेटियां बेटों के मुकाबले बुढ़ापे में अपने मां-बाप की सेवा अधिक कर रही हैं।
इनका प्रतिशत 28 है। लेकिन चार रिश्ते परिवार के चतुर्भुज हैं और अगर इसे ठीक से समझ लें तो स्वर्ग धरती पर उतर आए- सास, मां, बेटी और बहू। सास कितनी मां बनती है, बहू को कितनी बेटी माना जाता है और बेटी को बहू बनाते समय क्या समझाया जाता है।
भागवत ग्रंथ के अनुसार संसार में पहली पांच संतानों में तीन बेटियां थीं। तो परमात्मा बेटियों के प्रति अतिरिक्त उदार है, कृपावंत है, और यही काम हमें अपने परिवारों में करना चाहिए।








