पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  अपनी आत्मा तक पहुंचें और अभिनय से बाहर निकलें
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: अपनी आत्मा तक पहुंचें और अभिनय से बाहर निकलें

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2 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

हममें से अधिकांश लोग अभिनय ही करते हैं। अपने पद, पहचान, रिश्ते निभाने तक- सब में। और जब तक हम अभिनय कर रहे हों, अपनी आत्मा तक नहीं पहुंच सकते, क्योंकि उसके लिए अभिनय से बाहर आना पड़ता है।

ये गहरी बात आसानी से यूं समझ में आएगी कि शिव जी, पार्वती जी को रामकथा सुना रहे थे। और जब प्रसंग पूरे हो रहे थे तो पार्वती जी ने धन्यवाद-प्रस्ताव में एक टिप्पणी करी- हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।। आपने श्रीरामचरितमानस का जो गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया।

जब भी हम ईश्वर की कथा सुनते हैं, उसमें जो प्रसंग होते हैं, घटनाएं जो हमें संदेश दे रही होती हैं, यदि हम उन्हें सुनें और जीवन में उतारें, तो अपनी आत्मा की ओर आसानी से चल सकेंगे। इसलिए जब भी समय मिले, कथा सुनते रहें। और प्रयास करें कि जो हम मूल रूप से हैं, उस कथा के माध्यम से अपनी उस आत्मा तक पहुंचें और अभिनय से बाहर निकलें।

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