- Hindi News
- Opinion
- Pt. Vijayshankar Mehta’s Column Consider Food As Anna Yagya And Eat With A Pure Mind
4 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

पं. विजयशंकर मेहता
यदि होश में न हों तो भोजन मत करिए। तो क्या हम लोग बेहोशी में भोजन कर रहे हैं? सच यही है कि जब कभी हम भोजन करते हैं, हमें होश नहीं रहता। भोजन करते समय पूजा जैसी मानसिकता बनाएं। लंच और डिनर अन्न-यज्ञ जैसा है। इसमें ठिठोली या विवाद का अवसर ना रखें।
शांत मन से शुद्ध अन्न पाना सौभाग्य है। जिसने भोजन बनाया है, उसके प्रति आभार से भर जाएं। ईश्वर को धन्यवाद दें कि दो वक्त की रोटी नसीब हो रही है। लेकिन आज भोजन करते समय या तो लोग विचारों से भरे रहते हैं या लड़ रहे होते हैं। भोजन गरम मिले न मिले, पर लोगों का रुख गर्म हो गया है।
रोटियां कुरकुरी हों न हों, वाणी कर्कश हो गई है। डाइनिंग टेबल पर आक्रामक मुद्रा अशांति को आमंत्रण है। कई बार तो कुछ ऐसे विषय डाइनिंग टेबल पर ही पैदा होते हैं कि भोजन खत्म हो जाता है, पर कौन सही, कौन गलत की अंताक्षरी चलती रहती है। अब तो मोबाइल और टीवी भी भोजन की डिश बन गए हैं। भोजन को अन्न-यज्ञ मानें और पवित्र मानसिकता से भोजन करें।








