पलकी शर्मा का कॉलम:  दुनिया के तयशुदा नियमों को सिरे से बदल रहे हैं ट्रम्प
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पलकी शर्मा का कॉलम: दुनिया के तयशुदा नियमों को सिरे से बदल रहे हैं ट्रम्प

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5 घंटे पहले

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पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost - Dainik Bhaskar

पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की नाटकीय गिरफ्तारी महज सुर्खियां बटोरने वाला एक गुप्त अभियान नहीं था। यह एक संकेत था- मुखर, बेबाक और गहराई से विचलित कर देने वाला- कि डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह की दुनिया को आकार दे रहे हैं, उसमें शक्ति का प्रयोग किस तरह किया जा सकता है। वेनेजुएला पर हमला तेजतर्रार और निर्मम था। अमेरिका ने एक पदस्थ राष्ट्रपति को उसके आवास से उठा लिया। संदेश सीधा था : हमने यह किया, क्योंकि हम ऐसा कर सकते थे!

और यह केवल अमेरिकी विदेश नीति या लैटिन अमेरिका की क्षेत्रीय राजनीति को ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को भी तीन तरीकों से नया आकार दे रहा है। पहला, यह “जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली भू-राजनीति की वापसी का संकेत है। नियम, प्रक्रियाएं और संस्थाएं अब अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक सजावटी वस्तुओं की तरह हैं। अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से कोई सबूत पेश नहीं किया। उसने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का रुख नहीं किया। उसने वैधता की तलाश नहीं की। उसने एकतरफा कार्रवाई की- क्योंकि वह कर सकता था।

यह ट्रम्प की क्लासिक शैली है। पहले कार्रवाई, बाद में सफाई। उनकी घरेलू राजनीति में हम इसे बार-बार देख चुके हैं- ऐसे कार्यकारी आदेश जो कानून की सीमाओं को परखते हैं, अदालतों से खुला टकराव और वैध प्रक्रियाओं के प्रति तिरस्कार। अब यही रवैया विदेश नीति में निर्यात किया जा रहा है। और दुनिया देख रही है।

अगर दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र इतनी सहजता से किसी देश की सम्प्रभुता की अनदेखी कर सकता है, तो दूसरों को कौन रोकेगा? चीन को ताइवान के खिलाफ आक्रामकता बढ़ाने से कौन रोकेगा? रूस को यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की का अपहरण करने से रोकने वाला कौन बचेगा? क्षेत्रीय ताकतों को कानून के बजाय बल प्रयोग से अपने विवादों को सुलझाने की मनाही अब क्यों कर होने लगेगी?

यही वह खतरनाक मिसाल है, जो अब दुनिया की तमाम राजधानियों तक पहुंच रही है। दूसरे, ट्रम्पवाद पुरानी शैली के प्रभाव-क्षेत्रों को फिर से जीवित कर रहा है। यह शीत युद्ध वाली सोच है, जिसे आज के सौदेबाजी वाले दौर के हिसाब से अपडेट किया गया है। ट्रम्प के संकेतों के मुताबिक पश्चिमी गोलार्ध अमेरिका की जागीर है। इसमें वेनेजुएला, कोलम्बिया, क्यूबा, यहां तक कि ग्रीनलैंड तक को सम्प्रभु देशों नहीं, बल्कि रणनीतिक परिसंपत्तियों के रूप में देखा जा रहा है।

इस गोलार्ध से बाहर किसी को अलग-थलग कर देने की अमेरिका की तत्परता भी उतनी ही चौंकाने वाली है। ट्रम्प ने रूस के खिलाफ यूक्रेन की स्थिति को कमजोर कर दिया है, उन्होंने यूरोप में अमेरिका की पारम्परिक गठबंधन संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया है और नाटो की तो उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

दूसरी तरफ, एशिया में उन्होंने जी-2 का विचार रखा है- यानी दो देशों का समूह : अमेरिका और चीन। गरज ये कि दो महाशक्तियां ही दुनिया के नियम तय करें और बाकी देश किनारे बैठकर देखते रहें। यह बहुपक्षीयता नहीं है। यह वर्चस्व का प्रबंधन है। और यह अन्य संशोधनवादी ताकतों को पूरी तरह रास आता है।

तीसरे, यह ट्रम्पवाद दुनिया को फिर से संसाधनों की खुली होड़ों की ओर धकेल रहा है। कुछ समय तक ऐसा लगने लगा था कि वैश्विक संघर्ष कच्चे संसाधनों की भूख से ज्यादा विचारधारा, पहचान या सुरक्षा संबंधी दुविधाओं से प्रेरित हैं। न तो यूक्रेन युद्ध तेल के कारण शुरू हुआ था, न गाजा संघर्ष और न ही दक्षिण एशिया में सीमा पर होने वाली झड़पें। लेकिन ट्रम्प इस समीकरण को भी बदल रहे हैं।

वेनेजुएला के मामले में तेल का खेल ही है। ग्रीनलैंड के मामले में दुर्लभ खनिजों पर ट्रम्प की नजर है। अब तो शांति की कीमत भी संसाधनों से तय की जा रही है। यूक्रेन से कहा गया है कि अमेरिकी मदद पर बातचीत आगे बढ़ने से पहले वह अपने दुर्लभ खनिज संसाधनों तक पहुंच प्रदान करे। जैसे-जैसे वैचारिक गठबंधन कमजोर पड़ रहे हैं, उनकी जगह संसाधन-आधारित साझेदारियां लेती जा रही हैं।

कूटनीति स्वयं बदल रही है। वह अब पहले से तेज, अधिक लेन-देन आधारित, अधिक सार्वजनिक और कहीं कम गोपनीय होती जा रही है। यह भारत की पारम्परिक शांत संवाद और रणनीतिक धैर्य वाली शैली से काफी अलग है। पर इस उथल-पुथल के बीच एक सकारात्मक पहलू भी है।

ट्रम्प की शैली से पुरानी, पश्चिम-प्रधान वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है। संस्थाएं बिखर रही हैं। सहमति का आधार टूट रहा है। और इस शून्य से कुछ नया उभर सकता है- एक अधिक वास्तविक बहुध्रुवीय व्यवस्था। यही भारत का घोषित लक्ष्य हमेशा से रहा भी है! अगर अमेरिका ही इतनी सहजता से किसी देश की सम्प्रभुता की अनदेखी कर सकता है, तो दूसरों को कौन टोकेगा? चीन और रूस को ताइवान और यूक्रेन के खिलाफ आक्रामकता बढ़ाने से कौन रोकने वाला है? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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