राजेंद्रन नारायणन का कॉलम:  हम आजीविका के अधिकार को कमजोर नहीं कर सकते
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राजेंद्रन नारायणन का कॉलम: हम आजीविका के अधिकार को कमजोर नहीं कर सकते

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7 घंटे पहले

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राजेंद्रन नारायणन अजीज प्रेमजी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

राजेंद्रन नारायणन अजीज प्रेमजी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन मामले में यह फैसला दिया था कि अगर राज्य पर नागरिकों को पर्याप्त आजीविका के साधन और काम का अधिकार सुनिश्चित करने का दायित्व है, तो जीवन के अधिकार से आजीविका के अधिकार को बाहर करना मात्र शब्दजाल होगा।

मनरेगा- जो कई सालों के सामाजिक आंदोलनों के नतीजे से आया था और जिसे संसद ने सर्वसम्मति से पारित किया था- जीवन के अधिकार के लिए काम के अधिकार को एक अनिवार्य शर्त के रूप में परिकल्पित करने वाला था। यह सार्वजनिक रोजगार की पुरानी योजनाओं से भिन्न था, क्योंकि मनरेगा के प्रावधान न्यायालय में प्रवर्तनीय अधिकारों के समान थे। यह अधिनियम अकाल-राहत उपायों, पानी के स्रोतों के पुनरुद्धार, ग्रामीण संपर्क व्यवस्था आदि के माध्यम से दीर्घकालिक और सतत संपत्तियों के निर्माण कर सकता है और संकट से राहत की भी परिकल्पना करता है।

इसने कई सकारात्मक परिणाम दिए। मनरेगा शुरू होने के कुछ सालों में ही श्रमिकों की आय में वृद्धि हुई और कुल मिलाकर गरीबी घटी। कृषि के ऑफ-सीजन में दलित और आदिवासी परिवारों की खपत में लगभग 30% तक की बढ़ोतरी हुई। इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के मुताबिक, मनरेगा की लगभग 45% महिला श्रमिक या तो पहले काम नहीं करती थीं या केवल पारिवारिक खेत पर ही काम करती थीं।

मनरेगा के अंतर्गत महिलाओं की औसत भागीदारी लगभग 55% रही है। यहां तक कि विश्व बैंक ने भी 2009 में इसे विकास में बाधा कहने से हटकर 2014 में इसे ग्रामीण विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण बताया। कोविड काल के दौरान मनरेगा की भूमिका दर्ज की गई है।

लेकिन मनरेगा को रद्द करने के आभास मिलते रहे थे। लगातार अपर्याप्त बजट आवंटन की वजह से मजदूरी भुगतान में निरंतर देरी हुई, जिसे वित्त मंत्रालय ने भी स्वीकार किया है। बजटीय सीमाओं के चलते अधिकारियों ने काम की राशनिंग दो तरीकों में से किसी एक के माध्यम से करनी शुरू की : (एक) कई परिवारों को कम दिनों का रोजगार देना और/या (दो) कम संख्या में परिवारों को अधिक दिनों का काम देना। मजदूरों, शोधकर्ताओं और कार्यकर्ताओं ने बार-बार अधिकारों से वंचित करने वाले कदमों की ओर ध्यान आकर्षित किया। ये अपारदर्शी और अपरीक्षित तकनीकी पहलों- जैसे फोटो-आधारित उपस्थिति ऐप और जटिल भुगतान प्रणालियों से उत्पन्न हुए थे।

इसी परिप्रेक्ष्य में नए कानून को बिना किसी परामर्श के संसद में जबरन पारित कर दिया गया है। इसकी धारा 5(1) सरकार को यह तय करने के मनमाने अधिकार देती है कि सार्वजनिक कार्य कहां, क्या और कैसे होंगे। इससे पंचायत राज की आजादी खत्म होती है और केंद्र को अपार शक्तियां मिल जाती हैं। धारा 4(5) के तहत केंद्र सरकार तय करेगी कि किस राज्य को कितना आवंटन होगा।

जैसा कि सांसद मनोज झा ने कहा, यह नागरिक-केंद्रित, मांग-आधारित कानून को उलट कर इसे आदेश-आधारित बना देता है, जिससे यह केंद्र प्रायोजित, आवंटन-आधारित मॉडल में बदल जाता है और राज्य केंद्र की कृपा पर निर्भर हो जाते हैं। वर्तमान में मनरेगा के 90% खर्च केंद्र सरकार करती है और 10% राज्यों द्वारा किया जाता है। नए कानून की धारा 22 के मुताबिक, उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर, केंद्र-राज्य वित्तीय अनुपात को 60:40 कर दिया गया है।

इन प्रावधानों को एक साथ देखने पर कुछ राज्यों के पक्ष में राजनीतिक पक्षपात और अन्य राज्यों के साथ भेदभाव की आशंका उत्पन्न होती है। गरीब राज्यों को मनरेगा के लिए केंद्रीय राशि की अधिक आवश्यकता होती है, लेकिन केंद्र-राज्य वित्तीय अनुपात में यह बदलाव और राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डालने से गरीब राज्य असमान रूप से अधिक प्रभावित होंगे।

वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की मजबूरी में राज्य काम की मांग को दबाने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे बेरोजगारी और पलायन बढ़ने की संभावना है। वर्ष के किसी भी समय काम पाने का मौका विशेष रूप से भूमिहीनों और महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

हालांकि नए कानून की धारा 6(2) में कृषि मौसम के दौरान 60 दिनों तक कोई रोजगार न देने का प्रस्ताव भूमिहीनों और महिलाओं के लिए बड़ा झटका साबित होगा। नए कानून में प्रति परिवार प्रति वर्ष 125 दिनों के रोजगार का दावा किया गया है। लेकिन वर्तमान स्थिति में जब प्रति परिवार औसतन सालाना काम के दिन लगभग 50 ही रहे हैं, तब 125 दिनों के रोजगार का दावा भी भ्रामक है।

मनरेगा गांधी के पंचायत राज के विचारों को आम्बेडकर की नागरिकों को अधिकारों के जरिए सशक्त करने की भावना के साथ जोड़ता था। पर नया कानून गांधी और आम्बेडकर- दोनों के विचारों पर प्रहार है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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