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- Navneet Gurjar’s Column Elders Have Said That Trees That Do Not Welcome New Shoots Become Stumps.
3 घंटे पहले
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नवनीत गुर्जर
जमाना एआई का है! आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है। भाव, भावनात्मक बातों और संवेदना जैसी चीजों का अकाल आने वाला है। बच्चे को मां की कस्टडी में देने को हम मां के संरक्षण में देना लिखा करते थे। एआई उसे मां की हिरासत में देना लिख दे रहा है! ऐसे कई भावनात्मक या भावानुवाद हैं, जहां एआई के कारण मशीनी उपहास हो रहा है।
इससे बचना या बचाना आखिर मनुष्य के हाथ में ही है। सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी! निश्चित ही एआई के कारण बहुत युगांतकारी परिवर्तन आ रहा है। आने वाला है। लेकिन क्षेत्र या कार्यक्षेत्र कोई भी हो, मनुष्य की चतुराई या उसकी कल्पना, संवेदना का अब इस एआई के दौर में भी कोई मुकाबला नहीं हो सकता। आगे भी नहीं होगा। बिल्कुल नहीं। कई ऐसी भावुक बातें हैं, संवेदनाएं हैं, जिन्हें दुनिया की कोई मशीन कभी महसूस नहीं कर सकती।
फिलहाल तो नहीं ही। वो बनारस के मणिकर्णिका घाट पर घंटों बैठकर जो कुछ महसूस होता है, या महसूस किया जा सकता है, क्या एआई वह कर सकता है? …कि कैसे मनुष्य का सबकुछ जब जलता-भुनता रहता है, तब आसपास की दीवारों की सीलन का पानी भी तपता, सूखता रहता है। कैसे घाटों पर जाजम बिछाए बैठे लोग आते-जाते लोगों के हाथों से गिरे चावल के दाने बीनते रहते हैं! वे नीचे फर्श पर ही बैठते हैं। क्योंकि वे कुर्सियों के पहले जन्मे हैं! असी घाट पर सुबह-ए-बनारस में क्या एआई यह कल्पना कर सकता है कि शंख जैसा भोर का नभ नजर आ रहा है। जैसे राख से लीपा हुआ चौका। जैसे केसर घोलकर रंगी हुई चौखट! टुकड़े-टुकड़े आकाश कैसे धीरे-धीरे इकट्ठा होता हुआ दिखता है, जैसे किसी दर्जी ने आसमान के सारे टुकड़ों को एक साथ करके सी दिया हो! किसी गुदड़ी की तरह!
बरसाने की लट्ठमार होली को देखकर, आदिकाल से गलत परम्पराओं और रूढ़ियों की मार सहती आ रही स्त्री के उस दिन के भावों को कोई एआई पढ़ पाएगा क्या, जिसमें वह कहती होगी कि लद गए वो दिन जब तुमने मुझे रूढ़ियों के नाम पर पीसा होगा, अब तो मैं अपनी हरियाली को खुद सींच रही हूं? किसी बाहरी हवा या किसी बारिश का लेशमात्र भी कर्ज नहीं है मुझ पर। होगी जन्म से मैं हिरन …पर अब शेर बनना चाहती हूं। बन भी गई हूं। यह भाव कोई तकनीक या कोई मशीन हमारे भीतर नहीं भर सकती।
ये सब भाव आम व्यक्ति के मन में उभर रहे हैं… कि कितनी नौकरियां जाने वाली हैं? कितने लोग बेकार होने वाले हैं? ठीक है! मशीन अपना काम करेगी। करती रहेगी, पर मनुष्य का काम कम नहीं होने वाला है। निश्चित रूप से, वे जो भाव होते हैं! भावनात्मक संबंध होते हैं! संवेदनशीलता होती है, यह सब मशीन नहीं कर सकती। केवल मनुष्य और उसका दिमाग ही यह कर सकता है। आखिर एआई को भी बनाने वाला तो मनुष्य ही है!
कुल मिलाकर, वो काम जो मशीन कर सकती है, वही मनुष्य करता रहेगा तो नौकरी जाएगी ही जाएगी। आज नहीं तो कल। हमें मशीन से आगे निकलना होगा। दिमाग जो केवल मनुष्य के पास ही है, उसका भरपूर इस्तेमाल करना होगा। बहुत कुछ नया सोचना होगा। यह सब किया तो हम अपना काम कुशलता से कर पाएंगे और मशीन हमारा बाकी काम संभालेंगी। हमें पूरा वक्त मिलेगा- सोचने का, समझने का और इम्प्लीमेंट करने का।
इतिहास गवाह है जिन कम्पनियों या लोगों ने नई टेक्नोलॉजी को समय रहते नहीं अपनाया, नई और ज्यादा अलग करने की सोच को हमेशा दुत्कारते रहे, वे इतिहास में ही समा गए। बरबाद हो गए। समय ने उनके ऊपर धूल डालने में किंचित् भी देर नहीं लगाई। इसीलिए बड़े-बूढ़े कह गए हैं कि जो पेड़ नई कोंपलों का स्वागत नहीं करते, आखिरकार ठूंठ हो जाते हैं!
जिन्होंने नई सोच को दुत्कारा वो इतिहास में ही समा गए…
इतिहास गवाह है जिन कम्पनियों या लोगों ने नई टेक्नोलॉजी को समय रहते नहीं अपनाया, नई और अलग करने की सोच को हमेशा दुत्कारते रहे, वे इतिहास में ही समा गए। समय ने उनके ऊपर धूल डालने में किंचित् भी देर नहीं लगाई।








